जिस एक क्षण का इंतज़ार आप क्षण के सबसे निम्नतम ईकाई को भी गिनते हुए कर रहे हों, वह जब सामने होता है तो आप अ-चेत से हो जाते हैं। मन में इतनी उथपुथल होती है कि जबान समझ ही नहीं पाती कौन सी बात बोलें कौन सी नहीं, अनन्तः होता यह है हमें चुप्पी जकड़ लेती है। आज भी वही हुआ.. जो होता आया है। दिनों से मन में बने एक एक सपने अनगिन संवाद सब गायब हो गए, मैं निःशब्द सा खड़ा रहा। मन किया काश मेरी अँकवार इतनी बड़ी हो जाती अभी की शर्म और झिझक सहित उसे समेट पाता.. पर यह कहाँ सम्भव है। वह आई चली गई..महसूस करने भर का भी समय नहीं दिया समय ने। भीतर केवड़े के फूल की सी महक भर रही थी अचानक वो उड़ गई। महक को कैद भी तो नहीं किया जा सकता। खैर ठीक है..
जिस स्पर्श के लिए हम तड़प रहें हो उसे स्पर्श न कर पाने के बाद जो टीस पैदा होती है... उसे कहा तो नहीं ही जा सकता। हम कुछ ही आँखों में तो इंतज़ार देखना चाहते हैं.. और तो सब एक दूसरे से ऊबे ही हुए हैं।
मैं इतना हल्का क्यूँ नहीं हो पा रहा हूँ कि हर चीज़ त्वरित रूप में स्वीकार लूँ और जैसे मिल रहा हो उसे वैसे स्वीकार लूँ ? मेरी मिट्टी हमेशा पूर्ण सत्य और पूर्ण समपर्ण की मांग क्यूँ करती है ? जबकि यह जगजाहिर है कि सत्य और समपर्ण जैसा कुछ बचा ही नहीं। जो बचा है उसकी कद्र नहीं बची है। तो क्या मेरा प्रेम भी ? अगर ऐसा हो तो महादेव मुझे आज की रात पूरी न देखने देना।
********
मानवीय रिश्तों को समझना सबसे कठिन है, कभी कभी यह जितना सरल लगता है यह उतना ही कष्टकारी हो जाता है। हम वहां सबसे कम खड़े होते हैं जहाँ हमारा सबसे ज्यादा इंतज़ार होता है।
*********
इस वर्ष मलयालम फिल्मों के प्रेम में रहा, मुझे परिवारिक फिल्में ही ज्यादा पसंद आती हैं, मन भर आता है। पढ़ नहीं पा रहा हूँ । क्यूँ ? पता नहीं। मन लगता ही नहीं। कई परीक्षा करीब है मगर..भीतर की परीक्षा में फेल ही होता जा रहा हूँ।
कभी कभी तो मुझे नियति पर संदेह होता है, यह पहले से लिखी है या तब लिखी जाती है जब मैं कुछ सोच लेता हूँ।
और सब ठीक है। आज बहुत खुश हूँ।
― 26 दिसम्बर 2024 / 8 बजे शाम
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें