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स्वसंवाद

सुंदर सपने को एक बार और देख लेने की चाहत बड़ी अजीब होती है। हम उस मोह में टूटी नींद के बाद फिर नींद लाने का लाख जतन करते हैं पर आती नहीं। आ भी जाती है तो वह सपना नहीं आता जिसके लिए नींद को मनाया जा रहा होता है। एक बार उठा, फिर लेट गया। सुबह देर तक बिस्तर में पड़ा रहा, मगर...

टूटे हुए सपने और भविष्य के नाम टाल दी गयी योजनाएं बड़े किस्मत वालों की ही पूरी होतीं हैं। हर दिन की अपनी मजबूरी होती है, और हर नए दिन की अलग आवश्यकता, अलग इच्छा है। प्रयास करो चीजें टालो नहीं, जब जो मन करे जी लो..'अगले पल' जैसे शब्द के चक्कर में मत जिओ। 

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मन कुछ अनमना सा था थोड़ी देर प्रश्नों से जूझता रहा फिर लगा खोपड़ी आँख से टपक जाएगी तो सब समेट कर लेट गया। थोड़ी देर लेटने के बाद बाबा की एक बात याद आयी और उठ बैठा, वो जो बात याद आई वो बात वही थी जो सबके बाबा या पिताजी सबको कहते हैं। अरे भई वही 'दिन में सोना बीमारी का घर' , उठा तो इधर उधर कुछ घड़ी चलता रहा, फिर मन में आया, बिखरी चीजों को सही कर देते हैं। शुरू हुआ तो पहले पहल हर कोने से, बिस्तर के नीचे से सिक्के निकले उन्हें गुल्लक में भरा, पापा की डाँट याद आई, उनके साथ रहने के दौरान भी जो रोज सिक्के बचते थे मैं इधर उधर रख देता, वो रोज कहते इनसे सब्जी ले लिया करो या टैक्सी वाले को दे दिया करो मगर मुझसे नहीं होता था.. सिक्के लेकर चलना और सिक्के खर्च करना मुझे बहुत अजीब लगता है। पता नहीं क्यूँ, मुझे सिक्कों की आवाज़ में कई पनीली आँखें दिखती हैं  रिरियाते स्वर सुनायी पड़ते हैं। दस दस के कई नोट मिले, दस दस के आठ नोट, उसे लेकर कुछ देर बैठा रहा, उन दिनों की याद ने जैसे पीठ पर धप्पा मार दिया जब एक दस की एक फ़टी नोट को हम टेप से चिपकाकर जेब में रखकर महीनों स्कूल गए थे, इस दिमाग से की साइकिल में कुछ हुआ तो सही करवाने भर का रहेगा। नोट फट गई कहना पैसा नहीं है कहने से तनिक ज्यादा सम्मानजनक महसूस होता था। वो साल कितना अजीब था। बड़े चेहरों की असलियत देखी थी उस साल, अब जब कोई कहता है भईया ये काम है पैसा दे दो.. मुझे याद आता है हम पांचों लोग मर मर जिये थे मज़ाल है जो किसी ने कभी पूछ भर लिया हो। मगर ख़ैर ठीक है.. 

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हम बार बार स्मृति में क्यूँ लौटते हैं ? मैं अपने बचपन के 5  बरस के बाद किसी भी दिन को याद नहीं करना चाहता, मगर जाने क्यूँ हर घटना का कोई न कोई बिम्ब वहाँ से जुड़ जाता है और मैं जैसे जबरन वहीं लौट जाता हूँ। मुझे ननिहाल से बहुत प्रेम मिला, परिवार से भी मिला ऐसा लिखने के लिए लिख सकते हैं। 

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चीजें सही करने चलो तो हम ख़ुद ही बिखर जाते हैं। एक एक चीज़ एक एक स्मृति है। उन दस के नोटों को बगल रखा, उसी कम्बल से लिपट कर फिर लेट गया जिसमें मेरे जीवन की महक है.. इसे वो ओढ़ी थी, वो कौन ? वो जिसने मुझे जन्म दिया, मुझे इस वीरानी में खड़े रहने लायक बनाया। तुम मेरी माँ ही हो न ? 

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वो जब भी आती है मैं पहले पूछता हूँ कब जाना है ? क्यूँ पता नहीं, दरअसल मैं जाने के लिए पहले से तैयार होना चाहता हूँ। कुछ दिन और.. न जाने हम.. ख़ैर 

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शाम को चाय पीते हुए मन में आया था महादेव से माफ़ी माँग लूँ.. आया तस्वीर के सामने धूप जलाया, उनसे फिर थोड़ा और समय माँग लिया। वो नाराज़ थे मगर मान गए, मेरे नावाराशि हैं न,मेरी ही तरह पागल हैं.. हम तो आए ही विष पीने के लिए हैं। पीएंगे। पार्वती हमें बचाती रहेंगी। हम हँसते रहेंगे। जो हर जगह से नकार दिए जाते हैं वो हमारी शरण आते हैं। और हम हर जगह से भागकर उसके पास जाते हैं.. 

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पार्वती.. 

शिव को पार्वती ही प्रेम कर सकती हैं और पार्वती को केवल शिव ही। 


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इन दिनों कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ। भीतर अजीब सा सन्नाटा है। आप मानेंगे नहीं मगर है.. लिखते हुए मैं इतना ज्ञान क्यूँ देता हूँ ? मुझसे ज्यादा है सबके पास। खुद को डाँट पाता तो अभी उसे तेज से डाँट लगाता और कहता 'तू चुप ही रहा कर साले..' अरे ऐसा तो मैने कभी किसी को अति क्रोध में भी नहीं बोला है। इतना क्रोध ख़ुद से ही किया जा सकता है। 

फिर ज्ञान..

बस अब चुप हो जाओ !


― आशुतोष प्रसिद्ध 

29 दिसम्बर 2024 / शाम 7 बजे 

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