एक चिट्ठी लिखी, थोड़ी देर बाद पढ़ा, फिर फाड़ दिया। कारण क्या है पता नहीं, उसे पढ़कर मुझे एंजाइटी हो रही थी, मैं यह पीड़ा किसी को नहीं होने देना चाहता। पहले चिट्ठी लिखते हुए लगता था सब कहने का यही माध्यम है। अब चुप रह लेता हूँ। चुप रहकर भी कुछ लगता है भीतर.. वो कुछ क्या है यही ख़ोज रहा हूँ।
सुबह लक्ष्मण सर से बात हो रही थी, उन्होंने एक बात बोली, जो सुबह से रह रह कर मन में चले जा रही है, उन्होंने कहा , 'रिश्ते में जो आदमी बैलेंस करके चलता है वह इमोशन की कद्र नहीं करता और जो इमोशन के साथ चलता है वह बैलेंस नहीं करता, वह अपने आसपास के लोगों की भावनाओं की कद्र करता हुआ जीता है, पर ऐसे लोग कम हैं, और जो हैं वो दुःखी हैं क्योंकि वो अकेले हैं'
दिनभर कुछ किया नहीं विशेष, कुछ पन्ने पलटे, कुछ पुराना लिखा पढ़ा, कुछ स्मृतियों में खोया रहा, इंतज़ार का एक और दिन कम किया जैसे तैसे..कल एक और दिन कम हो जाएगा।
निराला रचनावली शुरू किया है, निराला को लेकर मैं भावुक हूँ, इसीलिए उन्हें मनभर पढ़ना चाहता हूँ, जिससे भावना से अलग होकर उन्हें समझ पाउँ, पर क्या ये होगा ? मुझे नहीं लगता। निराला ने हमें वह राह दिखाई जिससे मैं बस डरता था..उन्हीं की छाँव में हम बैठे।
मुकेश जी का एक गाना आज दिनभर लूप पर बजा है ' पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो ' आह अदभुत गीत है। रफ़ी साहब आज होते तो 100 वर्ष के होते। उनका बड़ा अहसान है।
दिनभर ठण्डी हवा चलती रही , मन भसकता रहा। और जो सोच रहा हूँ उसे लिखना नहीं चाहता अब..
― आशुतोष प्रसिद्ध
24 दिसम्बर 2024 / 8:15 शाम
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