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मन की पेंदी

मन जैसी चीज़ बनाई क्यूँ गयी ? यह सचमुच है या किसी लेखक की कल्पना का उत्पात है जो बरसों से लोगों के जीवन में आतंक की तरह रह रहा है।  मन बिन पेंदी के लोटे से भी गया गुजरा है, वह न ठहरता है न ठहरने देता है।  अरसे बाद अपना खून देखा, काम की हुई हथेली में जमा हुआ नहीं, सुंदर लाल खून, अभी तक गाढ़ा ही है। आशंका और एंजाइटी से इतर जब हाथ पाँव काँपते हैं तो मन के लोटे में पेंदी लग जाती है, वह रुक जाता, उस क्षण जो मुँह से पहला नाम निकलता है समझो वही आपका जीवन सार है..  आज तुम्हारा नाम निकला.. तो क्या मेरी ज़िंदगी तुम्हारे कन्धे पर पूरी होगी।  धन्यवाद आज के दिन के देवता..  ― 19 दिसम्बर 2024 / 11: 30 रात