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जो दबा दिया गया था।

क्या लिखूँ ? क्या यह लिखूँ ही कितनी बार कुर्सी से उठा ग़ुसलख़ाने गया, आलमारी की किताबें उठाया धरा, दो बार कपड़े बदले, सूखे हुए फूलों से महक लेने का असफल प्रयास किया, दो चार पन्ने भी न पढ़ पाने का शोक लिखूँ ? क्या लिखूँ की सारा दिन बीत जाता है कोई संवाद करने वाला तक नहीं। कितनी देर अपने साथ रहा जा सकता है, यहाँ लोग हफ्ते भर कहीं जाते नहीं तो परेशान होने लगते हैं और जो सालों से बस सपना देखकर जी रहा हो उसका क्या ? ख़ैर मैं सवाल किससे पूछ रहा हूं ? शायद खुद से। सवाल अपने आप से ही पूछे जाते हैं जवाब हम दूसरे से सुनना चाहते हैं।  **************** एक सवाल चल रहा था कई दिनों से हिम्मत नहीं हो रही थी कि कैसे पूछे, फिर लगा साफ साफ पूछते हैं जवाब सकारात्मक हुआ या नकारात्मक लोड नहीं लेना है। पूछा। जवाब सकारात्मक था। पेट मे अजीब सा हुआ , आंख पसीज गई। भीतर से प्रेम जैसे उफ़न उठा। रो लिया। फिर बैठ गया अकेले..  साँझ घिर आई है, मन बैठा जा रहा है, मन कर रहा है किसी से बात कर लूं, फिर लगा नहीं इंतज़ार कर लेते हैं। स्वतः आता है कुछ तो मन से आता है।  **************** जीवन शब्द का अर्थ जिनके होने से ...

तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ।

साँस रुकने से पहले पहले, सारी राह चल लेना चाहता हूँ, सारी दुनिया एक बार देख लेना चाहता हूँ तुम्हारे साथ.. अकेले नहीं। आदमियों को भले न देखूँ पहाड़ों और नदियों को छू लेना चाहता हूँ, हर तरह की जमीन का पेड़ लगा लेना चाहते हूँ उस घर में जहाँ तुम रहोगी, हर तरीके से कर लेना चाहता हूँ इज़हार, ताकि मरते वक्त मन आश्वस्त रहे कि कर पाया हूँ वैसा प्यार जैसा सोचता था, रह पाया हूँ उतना समर्पित जितना इस युग में रहा जा सकता है। बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी चाह बना रहूँ मैं जब तक है मुझमें चेतना..  इतना तो चाहा ही जा सकता है न ?  ************* उस शहर में हूँ जहाँ रहकर वह नहीं कर पाया जो करने का सोचकर आया था, लखनऊ यूनिवर्सिटी के पीछे और महमूदाबाद हॉस्टल के सामने देर तक खड़ा रहा, वहाँ से पैदल बढ़ा कपूरथला चौराहे तक, एक कैफे में चाय पी, यूनिवर्सल बुक सेंटर गया कुछ किताबें ली, फिर वहां से पैदल ही पापा के ऑफिस की तरफ गया , पब्लिक लाइब्रेरी के सामने दो पल रुका, उस जगह जाना चाहता था पर नहीं गया, वो कोना निहारा जहाँ साइकिल खड़ी करता था, ठीक ठीक ढंग से साहित्य यहीं पढ़ा था, मन भर,  अमीनाब...

स्मृति का नमक

वह सब कुछ जो कह देना चाहिए था  मैंने छिपा लिया। स्मृति का नमक लादे  चढ़ता रहा इच्छाओं के पहाड़ पर,  नमक नहीं गला  अब नमक नहीं गलते  मैं गलता गया  पहाड़ की तलहटी में ही  त्याग दिया अपनी देह  जो अभी कुछ क्षण पहले तक  किसी की होने के लिए तड़प रही थी अब बह रही है पानी की तरह  आगे यही गंगा में मिल जाएगी  मगर गंगा न हो पाएगी !  ************  तो क्या ज़िंदगी इतनी ही आसान है ? जितनी आसानी से आपने अभी इन कविता नुमा पंक्तियों को पढ़कर ख़त्म किया। नहीं है, न कभी आसान होगी। यह स्मृतियों का नमक इतना कठोर है कि वह कई कई जन्म गलाएगा मेरी देह, मेरी इच्छा, फिर भी खुद न गलेगा। क्या यही कारण है कि नमक गलने से ज्यादा गलाने के काम आता है ? यही होगा ही।  ************* तो फिर क्या बताऊँ की कैसा बीता दिन, बीता नहीं, मैंने किसी भारी पत्थर की तरह धकेल कर, चेहरे की नसें तन जाने तक जोर लगाकर जैसे तैसे खिसकाया यह दिन... मैं हर बार अपनी ही इच्छा के बोझ तले दब जाता हूँ, कल्पनाओं का महल खड़ा करता हूँ जिसे वास्तविकता सहजता से हल्के झोंके से ढहा क...

बसंत का पीलापन

धारा एक बार टूट जाए तो फिर उसमें वो रवानी भी टूट जाती है। धारा फिर लौट सकती है रवानी नहीं लौटती। मन किसी व्यक्ति, वस्तु, जगह, या भाव से एक बार हट जाए तो फिर जुड़ता नहीं है, उसमें न वह विश्वास बचता है न पहले सी टीस... हम फिर एक सामाजिक गरिमा को जीते हैं सम्बन्धों को नहीं। मन भी ऐसा ही है जब उसे बार बार तोड़ा जाए, वह कहा जाए जो नहीं कहना चाहिए, वह दिया जाए जो वह स्वतः स्वीकार नहीं करना चाहता तो फिर मन धीरे सूख जाता है। यह वैसे ही है जैसे किसी पौधे की कटिंग करना और उसे बढ़ने का अवसर न देना। कटिंग तब ठीक है जब बढ़ने का अवसर दिया जाए अन्यथा पौधे सूख जाते हैं। सूख जाना भी चाहिए।  *********** आज बसंत पंचमी है, आज ही की तिथि पर पहली बार महाप्राण की कविता ' वीणा वादिनी वर दे' पढ़ी थी, तब शायद मैं छठवीं में था, मेरे हाथ पाँव काँप रहे थे, मुझे मुख्य बनना कभी पसंद नहीं था मैं नेपथ्य में रहना चुनता था, मगर क्रेडिट की इच्छा बनी रहती थी, बचपन में.. अब कोई फर्क ही नहीं पड़ता।  मैं कोई हूँ.. यह भी अब जल्दी सोचता ही नहीं। ऐसी ही एक तिथि को जब मैं आठवी में था तो एक नाटक बनाया था, नेता कार्...

मन संवाद

जीवन धीरे धीरे क्या होता जा रहा है पता नहीं, अपने प्रति आशंकाओं से भर गया हूँ। जीवन जीना कम बचे रहना ज्यादा लगने लगा है। पुरानी गलतियों का पछतावा है पर उन्हें बदल नहीं पा रहा हूँ। हर कदम किसी नयी विफलता की तरह लगता है। एक चुप्पी घेरे रहती है। जबकि एकदम सही रूटीन में हूँ पढ़ रहा हूँ, खा रहा हूँ, सो भी जा रहा हूँ.. आसपास घर परिवार भी सब ठीक है, पर भविष्य की चिंता जैसे मेरी जबान सिल देती है, अजीब सी थकन हावी हुई रहती है। इन दिनों कोई प्रेमवश भी पूछ लेता है पैसा भेज दूँ ? या ठीक तो हो ? तो चिढ़ होती है, अलग अलग जगहों पर हाथ पाँव मार रहा हूँ, पर जैसे हर जगह से धकेल दिया जा रहा हूँ। मन करता है कोई कन्धा मिल जाए, जिससे सब कह सकूँ, पर क्या कहना चाहता हूँ वह भी नहीं पता है.. सब अधर में है। समझ भी सब आता है पर उस समझने में जीवन नहीं दिखता। फिर यह भी सोचता हूँ मैं जिसका कन्धा चाह रहा हूँ उसका कन्धा मैं ही क्यूँ न बन जाऊँ.. मन दबा लेने में क्या हर्ज़ है। अपने मन का कुछ बोलने पर या मन की कोई इच्छा कह देने पर लगता है कहीं मैं भार तो नहीं डाल रहा हूँ उस पर, जिसे सबसे हल्का रखना चाहता हूँ। कई...