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जो दबा दिया गया था।

क्या लिखूँ ? क्या यह लिखूँ ही कितनी बार कुर्सी से उठा ग़ुसलख़ाने गया, आलमारी की किताबें उठाया धरा, दो बार कपड़े बदले, सूखे हुए फूलों से महक लेने का असफल प्रयास किया, दो चार पन्ने भी न पढ़ पाने का शोक लिखूँ ? क्या लिखूँ की सारा दिन बीत जाता है कोई संवाद करने वाला तक नहीं। कितनी देर अपने साथ रहा जा सकता है, यहाँ लोग हफ्ते भर कहीं जाते नहीं तो परेशान होने लगते हैं और जो सालों से बस सपना देखकर जी रहा हो उसका क्या ? ख़ैर मैं सवाल किससे पूछ रहा हूं ?

शायद खुद से। सवाल अपने आप से ही पूछे जाते हैं जवाब हम दूसरे से सुनना चाहते हैं। 
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एक सवाल चल रहा था कई दिनों से हिम्मत नहीं हो रही थी कि कैसे पूछे, फिर लगा साफ साफ पूछते हैं जवाब सकारात्मक हुआ या नकारात्मक लोड नहीं लेना है। पूछा। जवाब सकारात्मक था। पेट मे अजीब सा हुआ , आंख पसीज गई। भीतर से प्रेम जैसे उफ़न उठा। रो लिया। फिर बैठ गया अकेले.. 
साँझ घिर आई है, मन बैठा जा रहा है, मन कर रहा है किसी से बात कर लूं, फिर लगा नहीं इंतज़ार कर लेते हैं। स्वतः आता है कुछ तो मन से आता है। 

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जीवन शब्द का अर्थ जिनके होने से खुलता है, उनके बिना जीवन बोझ की तरह लगता है। ऊब की चलती फिरती मूर्ति की तरह हो जाता है आदमी.. हो ही जाना चाहिए। 
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किसी साल आज के दिन लाइब्रेरी में था जीवन देख रहा था.. 
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काश पहले का समय लौट आता, सब साथ रहते, कम दिखावटी समय होता, कम खाने को मिलता। साथ जीने का सुख तो मिलता। काश , रेलगाड़ी न चलती होती।
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7 साल पहले आज के दिन पहली बार लिखा हुआ नवभारत टाइम्स में छपा था। खबर, चौराहे के एक दुकानदार ने फोन करके दी थी। मुझसे ज्यादा वो ख़ुश थे कि मैं उनका परिचित हूँ, दिन भर दुकान पर आए हर आदमी को पढ़वाया उन्होंने मेरा लिखा... तबसे आज तक वो मेरा नाम नहीं लेते.. देखते ही कहते हैं और कवि महोदय और हँस देते हैं। मुझसे उम्र में बहुत बड़े हैं ,बचपन में हम उनके यहाँ सीडी की कैसेट लेने जाया करते थे, अब तो उन्होंने कपड़े की दुकान कर ली है। सीडी कैसेट का जमाना जो चला गया। 

जीने के लिए बदलाव को स्वीकार लेना कितना जरूरी होता है। न चाहते हुए भी करना पड़ता है। जैसे नाव में टिके रहने के लिए पतवार हिलाते रहना वैसे जीवन में.. 

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सौंदर्य की नदी नर्मदा पढ़ रहा हूँ, कितनी सरल भाषा है। जैसे शब्दों की सरल धारा बह रही है, लिखने ऐसे ही जाना चाहिए। जाने को साल भर से सोच रहा हूँ, अब मन ही मर गया है। इस पुस्तक के तीन खण्ड है इसी से देखूंगा नर्मदा करूँगा मन यात्रा.. अपना अंत तो सरयू में ही होगा। 

― 9 फरवरी 2025 / 6:30 बजे शाम 

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