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कोउ लांघत कोउ उतरत थाहै

भले ही शब्द ब्रह्म हों लेकिन मैं अपनी अनुभूति को ठीक ठीक उनके सहारे भी नहीं कह पता। कई कई पन्नों में मन लिखता हूँ, फिर भी लगता रहता है कह नहीं पाया। और अजीब यह है कि उसके दो लाइन के जवाब में भी लग जाता है सब मन का हो गया। 
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कुछ करते हुए या किसी से बात करते हुए अचानक किसी का ख़्याल एक बार को आ जाए तो उसे कहते हैं 'याद आई थी आपकी' पर जब कोई लगातार मन में बना रहे, हर साँस के आरोह अवरोह के साथ बाहर भीतर हो तो उससे कैसे कहें कि याद आ रही है...?
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कल रात पता नहीं क्यूँ नींद ही नहीं आ रही थी, बड़ी मुश्किल से आखिरी पहर में आँख लगी। सुंदर सपना देखा। मन ख़ुश हो गया। आँख खुलते ही भाग गया सब्जी मंडी, वहां से लौटा तो चाय नसीब हुई, कल मंगलवार का व्रत था तो आज बिना नहाए कैसे पी सकते थे पानी। माता गयीं नाना के घर, आज घर पर मैं अकेले हूँ। शाम को ऊब रहा था तो आज घर के उस उस कमरे और कोने तक गया जहाँ जल्दी कभी जाना ही नहीं होता। दलान में रहते रहते भूल गया था कि घर में और भी कई कमरे हैं। हम अपने ही घर में रहते हुए नहीं रहते। घर के सभी कोनों को नहीं जानते। जैसे हम अपने करीबियों को नहीं जानते, एक पक्ष जानते हैं तो और सारे पक्ष भूल जाते हैं। पता नहीं मैं क्या कहना चाह रहा हूँ मगर कुछ तो...
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मेरे पास लगभग कोई बात नहीं होती है, फिर भी मैं याद के वशीभूत होकर फोन कर देता हूँ, मुझे बस आवाज़ सुननी होती है। मैं चाहता हूँ वो बात करके, वो सब पूछे,  वह सब भी पूछे जो मैं ख़ुद नहीं जानता। मैं अजीब पागल आदमी हूँ ।
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कितनी अजीब बात है न हमने लगभग 'अजीब' चीजों की पहचान कर ली है और उन्हें कहते हुए हम उनके साथ भी जोड़ते हैं 'अजीब' 
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हम क्यूँ जानना चाहते हैं कि कोई हमें कैसे महसूस कर रहा है ? मैं क्यूँ पूछता हूँ, मेरी याद आ रही है क्या? 
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लगभग लिखते हुए मन करता है मैं लिखूँ ' रोना आ रहा है' जबकि कई बार तो नही आ रहा होता है रोना। 

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लगभग स्थितियों में मेरी स्थिति 'कोउ लांघत कोउ उतरत थाहै' वाली हो जाती है। कैसे बताऊं.. मन से समझ लीजिए। शब्द नकाफ़ी हैं। 

― 19 फरवरी 2025 / 9 : 30 शाम 

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