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अपने साथ रहते हुए

हम बने बनाए खाँचे में फिट होने के आदी हैं। हम नया कुछ बनाना नहीं चाहते हैं। कोई बनाता दिख जाता है तो प्रयास करते हैं न बना पाए। हम सब ऊब से भरा जीवन जी रहें हैं। इसीलिए जी रहें हैं कि पैदा हो गए हैं। पैदा इसीलिए हो गए हैं कि हमारे माँ बाप पर उनके माँ बाप का दबाव था। हम सब बेमकसद पैदा हुई औलादें हैं। जिनका ठीक ठीक कोई मकसद नहीं है। अगर है भी तो अपने से पहले या अपने आसपास पैदा हुए लोगों से प्रतिस्पर्धा करना। उन्होंने ऐसा जीवन जी लिया, उन्होंने ये कर लिया, उन्होंने ये ले लिया, उनके बच्चे यहाँ पढ़ रहें हैं। दृश्य अदृश्य इतने दबाव हैं कि हम बढ़ने से पहले दब जाते हैं और बौने हो जाते हैं। बौना होना ही हमारी नियति है। 

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सुबह सुबह जे सुशील की एक किताब पढ़ी, 'दुःख की दुनिया भीतर है' जो उनका उनके पिता की स्मृति लेखा है। भावनाओं की नदी बहती है पढ़ते हुए।  

हम रक्तसम्बन्धीयों की बातों पर भावुक हो भी जातें हैं। उन पर बहुत कुछ बोलना चाहकर भी नहीं बोल पाते, हम उनके प्रति कृतघ्न होते हैं। किस बात के पता नहीं ? क्या केवल इस बात के कि उन्होंने हमें जन्म दिया ? वहाँ हम कहाँ फसे हुए थे कि जन्म लेकर ही मुक्त हो गए ? हम उनकी गलतियों को भी जस्टिफाई कर लेते हैं। 

पिता जीवन का ऐसा तत्व है जिनसे आप जीवन भर कितना भी असमहमत होइए अनन्तः उनसे सहमत हो जाते हैं। क्योंकि समाज आपको भी उन्हीं की तरह बना देता है। 

किताब पढ़ता रहा, अपने जीवन के कई फैसलों पर पछतावा करता रहा। बहुत सी बातों में ख़ुद को देखता रहा। ऐसे महसूस हुआ जैसे किसी जाल में फंस चुका हूं, अच्छा यही है छटपटाऊँ न, स्थिर होऊं और वह जियूँ जो जी सकता हूँ। 

पिता पुत्र के अंतरसम्बन्ध के लिए इस किताब को पढ़ना चाहिए, पुरुष मन की मजबूरी और जटिलता समझने के लिए भी। इसे पढ़ते हुए, या कोई भी प्रेम सम्बन्धों से जुड़ी पुस्तक पढ़ते हुए हमें तर्क का चोला दूर रखकर आना पड़ता है। जैसे मंदिर में जाने से पहले हम बाहर से नहाते है, साफ कपड़े पहनते हैं फिर जाते हैं, जबकि यह सम्पूर्ण सृष्टि उसकी है, पग पग कण कण उस ईश्वर का है, पर कुछ चीज़ें हैं जो हमें करनी ही होती हैं। कर लेनी चाहिए। 

अपनों की खुशी अपनी खुशी से बड़ी होती है..अगर मेरी माँ या पत्नी मुझसे कहें यह नहीं ये खाओ, यहाँ नहीं वहाँ बैठो, ऐसे चलो ऐसे बोलो, मैं उसे खुशी से करूँगा, उन्हें खुशी तो होगी, वो संतुष्ट होंगे यह जरूरी है। 

एक तरफ से देखेंगे तो जीवन में सब कुछ गैरजरूरी है और एक तरफ सब जरूरी, जरूरी बस वो लोग हैं जो कुछ करने से पहले आपकी आंख देखते हैं, जिनकी योजनाओं में आप हैं और कोई नहीं.. और सब फालतू लोग हैं उन्हें वैसे ही ट्रीट कीजिए, उनके लिए खुद को खर्च न कीजिए।

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दोपहर में एक फ़िल्म Mrs. देखी, शादी, परिवार समाज , पुरुषों की हम श्रेष्ठ वाली विचारधारा, पर केंद्रित है। अभिनेत्री ने अदभुत काम किया है। जैसे वह वही जीवन जी रही हो। उसकी आंख बोलती है पूरी फिल्म में। कुछ दृश्य ऐसे थे जहाँ भीतर शर्म भर गई। सेक्स के लिए आदमी जब स्त्री पर हावी होता है, तो वह भूल जाता है कि वह कितनी कोमल है, वह उसे रौंद देना चाहता है। टीवी चैनलों फिल्मों और एडल्ट फिल्मों ने पुरुषों के ऐसा करने को महिमामण्डित किया है। एड्स में भी स्त्रियों को ऐसा दिखाया जाता है कि वह उन्हीं पुरुषों पर रीझ रही हैं जो उनपर हावी हो सकते हैं, स्त्री के सुख की कहीं कोई बात ही नहीं है, वह सेक्स को किस तरह महसूस करना चाहती है कैसे जीना चाहती है इस भाव को ही खत्म कर दिया गया है। 

फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ वो पहली बार चाय बनाती है तो पुरूष उसे अलग कप लेकर आधी चाय देता है, वो कितना सुंदर दृश्य था कुछ मिनटों बाद फिर वही सीन आता है पुरूष हड़बड़ी में है उसे ऑफिस जाना है, स्त्री चाय बनाती है उसका कप भरती है, उसे पकड़ाती है अपने लिए कप उठाती है सोचती है फिर वो चाय आधी करेगा, तब तक वो जा चुका होता है.. उस पल उसकी आँखों में जो सूनापन तैरता है वह मन भीतर तक झकझोर गया। 

हम दिनचर्या की ऊब में अपने करीबी को कितनी छोटी छोटी बातों पर छोड़ जाते हैं जिसे सम्भाल लेने से साथ कितना सुंदर हो सकता है। अपनी किसी इच्छा पर, किसी विचार पर अपने साथी के साथ चर्चा करना सम्बन्धों में जान भरता है, रिश्ते वही सुंदर हैं, विश्वास से भरें हैं जहाँ एक दूसरे के लिए सहयोग भरा हो, कह देने की इच्छा भरी हो, अन्यथा वो बस नाम बचते हैं रिश्ते नहीं... 

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यह समाज जिस गति से फूहड़ता नग्नता और सिचुएशनशिप की तरफ बढ़ रहा है इसका बेड़ा गर्क ही होगा। हो ही जाना चाहिए। कभी कभी मैं प्रार्थना करता हूँ काश कोई तबाही आ जाए और यह सभ्यता नष्ट हो, अब इस सभ्यता में सभ्यता जैसा कुछ बचा नहीं है। सभ्य लोग शर्म संकोच से जीवन त्याग दे रहें हैं और असभ्य खुले आम घूम रहे हैं मंचों पर रेंक रहें हैं 

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सुबह जब उठा तो मन बड़ा ताजा सा था, कितना सुंदर सपना देखा था, मन प्यार से भर गया था, मुझसे कोई बात, कोई इच्छा पचती नहीं, जो मैं सुनता देखता सोचता हूँ सब उससे कह देता हूँ, नहीं कहता तो लगता है बेईमानी कर रहा हूँ, जीवन को जीवन का सब जानना ही चाहिए। उससे ज्यादा अधिकार किसी को नहीं है। किसी दिन उससे कहूँगा मुझे चिट्ठी लिखो... सालों से उसने नहीं लिखा मेरे लिए कुछ..

शाम से मन बहुत अजीब सा हुआ है.. एक जगह देर तक बैठा था। बगल एक पार्क है उसकी एक सीट है.. अभी लौटा तो डायरी लिए बैठा हूँ । आगे क्या करूँगा पता नहीं.. फोन करूँगा कहूँगा मुझे दिख जाओ...

― 10 फरवरी 2025 / 9 :10 शाम   

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