मैंने छिपा लिया।
स्मृति का नमक लादे
चढ़ता रहा इच्छाओं के पहाड़ पर,
नमक नहीं गला
अब नमक नहीं गलते
मैं गलता गया
पहाड़ की तलहटी में ही
त्याग दिया अपनी देह
जो अभी कुछ क्षण पहले तक
किसी की होने के लिए तड़प रही थी
अब बह रही है पानी की तरह
आगे यही गंगा में मिल जाएगी
मगर गंगा न हो पाएगी !
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तो क्या ज़िंदगी इतनी ही आसान है ? जितनी आसानी से आपने अभी इन कविता नुमा पंक्तियों को पढ़कर ख़त्म किया। नहीं है, न कभी आसान होगी। यह स्मृतियों का नमक इतना कठोर है कि वह कई कई जन्म गलाएगा मेरी देह, मेरी इच्छा, फिर भी खुद न गलेगा। क्या यही कारण है कि नमक गलने से ज्यादा गलाने के काम आता है ? यही होगा ही।
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तो फिर क्या बताऊँ की कैसा बीता दिन, बीता नहीं, मैंने किसी भारी पत्थर की तरह धकेल कर, चेहरे की नसें तन जाने तक जोर लगाकर जैसे तैसे खिसकाया यह दिन... मैं हर बार अपनी ही इच्छा के बोझ तले दब जाता हूँ, कल्पनाओं का महल खड़ा करता हूँ जिसे वास्तविकता सहजता से हल्के झोंके से ढहा कर चली जाती है। नीड़ का निर्माण फिर फिर आख़िर कब तक गाया जा सकता है? उत्साह भरने वाली तमाम चीजें एक समय के बाद उत्साहहीन हो जाती हैं।
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मैं अपनी नियति से लड़ रहा हूँ, नियति ने मेरी नाल गाड़ दी है यहीं , मैं तन से न सही मन से ही दूर दूर टहल आता हूँ, आज मैं दिन भर जंगलों में घूमा, खूंखार जानवरों को बिल्कुल शांत देखा, जहाँ होने के महीनों से सपने देख रहा था वहाँ थोड़ा थोड़ा पहुँच पाया, शायद थोड़ा भी नहीं,
शायद कहीं पहुँच पाना मेरी नियति में नहीं।
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आज मैं कुछ जगहों पर जाना चाहता था, वहाँ बैठना चाहता था, उन जगहों से बनी स्मृति को जीना चाहता था, इस बात को महसूस करना चाहता था कि क्यूँ लोग जन्मभूमियों और अंत्येष्टि स्थलों के लिए लड़ पड़ते हैं। वह मेरी जन्मभूमि थी। जन्म लेते मर जाने के बाद जहाँ मैं फिर से जन्मा। मगर न जा सका। मेरी नाल तो यहाँ गढ़ी है।
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एक बात पूछुं .?
; हॉं पूछो ..
मन की शक्तियों पर भरोसा है ?
; बहुत ज़्यादा
तब ठीक है, मैं समझ गयी।
और फिर चल दिया जीवन...
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अगर देवता हैं तो उनका शुक्रिया,
अगर नहीं हैं तो ....
देवी को दण्डवत !
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फिर ये दिन लौटें मगर इस तरह न लौटें, क़रीबी लेकर लौटें, दूरी तो ...
― 4 फरवरी 2025 / 8 : 40 शाम
हमेशा की तरह बहुत बेहतरीन 👌👌
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