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उस हाथ का स्वाद दुनिया के सभी हाथों से ज्यादा मन को भाता है जिन हाथों से प्रेम होता है। इन दिनों न जाने क्यूँ मुझे गाड़ी चलाते, कुछ करते, यहाँ तक की चुपचाप बैठे रहने के दौरान भी अचानक से तुम्हारे हाथ का स्वाद मन में उतर आता है। फिर मुझपर एक अजीब किस्म की रुमानियत छा जाती है। जब जब सुनता हूँ तुम कुछ बना रही हो, मैं कल्पना कर लेता हूँ तुम कैसे खड़ी होगी रसोई में, तुम्हारे छोटे हाथ कैसे चल रहे होंगे, तुम्हारे बाल कैसे जूड़े का रूप ले चुके होंगे और तुम्हारे चेहरे पर तल्लीनता की चमक छा गई होगी। मन होता उस मेहनत के एक हिस्से पर बस मेरा हक़ है।
यह स्वाद केवल खाने की बात से नहीं जुड़ता...और वह रुमानियत भी जो तुम्हारे ख़्याल भर से मुझमें भर जाती है। देंह ऐठने लगती है। मन होता है....
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इस दुनिया से जैसे समन्वय, सामंजस्य, समरसता, मनुष्यता, और धीरता खत्म होती जा रही है वैसे ही छू लेने की कला भी ख़त्म होती जा रही है। क्या मैं एक सुखमय छुवन को तरसते मरूँगा ? अपनी इच्छा से तुम कब छुओगी मुझे ?
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सुबह जल्दी आँख खुल गई थी। एक सपना था। उठ गया तो कुछ घड़ी पढ़ा। कुछ निबंध। फिर अमिताभ चौधरी का कविता संग्रह 'अर्थात' से कुछ कविता पढ़ी। एक पंक्ति पर मन रीझ गया।
एक
प्यास भरा व्यक्ति
इतना जलमग्न हुआ है
कि
उसके नाखून गल गए हैं।
― अमिताभ चौधरी
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कुछ शादियों में गया सुबह सामाजिकी दी, लड़कियों के घर वालों ले लटके चेहरे देखे, कुछ ख़ुश भी दिखे। भारतीय समाज में विवाह संस्कार किसी बड़े और भारी बोझ ही तरह परिजनों पर रखा होता वो जैसे ही इससे हल्के होते हैं, थोड़ा ख़ुश हो जाते हैं। मगर जब बेटी जाने लगती है तो चेहरा उतर जाता है, यह चेहरा फिर बेटी की हाल चाल और उस घर के व्यवहार से ही खिलता है। दिन भर चलता रहा हूँ। बताने जैसा कोई काम नहीं किया है। फिर भी थकान सी महसूस हो रही है। इन दिनों का मौसम अजीब है। मुझे यह मौसम बिल्कुल पसंद नहीं।
ख़ैर ! मेरी पसंद से कौन सा मौसम अच्छा बुरा होने वाला।
आज सुबह बेर के पेड़ के नीचे जाकर खड़ा था ख़ूब बेर लदी हुई है। बस खड़ा ही रहा। तोड़ा एक भी नहीं। पता नहीं क्यों। मैं ख़ुद नहीं जानता। जबकि खाने का मन मेरा पीछे कई दिन से हुआ था।
ढाक ( पलाश ) में फूल आ रहे हैं। प्रकृति ने सबसे लिए कोई न कोई समय तय किया है जब वह अपना सारा गुण दिखा सके। लोगों को अवाक कर सके। हमारा भी कुछ तो तय होगा ही...
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शाम को कुछ सब्जी लगाई। सूरजमुखी रह गई। कल शायद..
― 17 फरवरी 2025 / 7 : 45 शाम
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