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आशा हमें साँस देती है, उम्मीद ताकत


मन लगातार द्वंद्व से जूझता रहता है। क्या मन की निर्मित ही इसीलिए हुई की वह व्यक्ति को कभी स्थिर चित्त न रहने दे ? शायद इसीलिए लिए। स्थिर चित्त तो ज़िंदा लोगों का हो ही नहीं सकता ! वो संत हो या सामान्य आदमी। 

मन का कह देने में अदभुत सुख है, लेकिन कह देने के बाद मनोनुकूल न सुन पाने का दुःख ? उसका क्या ? वह दुःख ही होता है न ? या अपने व्यक्तित्व पर जन्मा संदेह, सम्भवतः संदेह ही ! क्योंकि जब हम अपने करीबियों से वह नहीं सुन पाते जो सुनना चाहते हैं तो अपने व्यक्तित्व पर ही संदेह होता है कि कहीं मैं ही वह भावना व्यक्त करने में असमर्थ तो नहीं। 

प्यार और आभार मन भर जताते रहिए। अपने प्रिय को कहते रहिए कि वह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है। यही एक राह है जिससे दुनिया से लगातार मिलते घावों को सहकर सुंदर जीवन जिया जा सकता है। पिछली बार कब ऐसा हुआ कि आपने अपने परिजन अपने प्रियजन से कहा कि ' मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ' नहीं कहा तो कहिए ! कोई पता नहीं कौन सा संवाद आखिरी संवाद हो 

जब जब कहीं कोई दुर्घटना होती है मैं तमाम हताहत चेहरे और शून्य पड़ चुकी देह में अपने को ही मरा हुआ और घायल देखता हूँ, मन और ज्यादा होता है कितना प्यार कर लूं कितना जी लूँ जीवन कि अ-समय मौत भी आए तो फोन में मिनट भर पहले ही तुमसे कह चुका होंउँ कि 'मैं ठीक हूँ, कुछ सोचना नहीं मैं हूँ न ' और तुम उस भरोसे पर जी सको खुशहाल जीवन। जीवन की खुशी तो उम्मीद में ही है। आशा हमें सांस देती है, उम्मीद ताकत। 

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देश भक्ति के रंग में इतना रंग गया है कि किसी का चेहरा पहचान नहीं आ रहा। ये श्रद्धालुओं की नहीं पाप करते लोगों का चेहरा है जो भयवश दौड़ पड़े हैं गंगा को मैला करने। इतना अमानवीय, इतना पशुवत व्यवहार इतना नोच घसोट लूट की मन करता है काश !..... 

अभी इलाहाबाद की भगदड़ से बना घाव भरा नहीं कि दिल्ली ने उसे फिर कुरेद दिया। जान तो जैसे हरी घास हो गई है जब मन हुआ चलाई हसियाँ काट ली मुट्ठी भर.. 

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कल रात भर नींद नहीं आई। आदर्श से बात होती रही रातभर। बात होती रही कहूँ की मैं उसकी बात सुनता रहा। वह पागल और जीनियस बच्चा है। तुमसे मिलना चाहता है, मैं कुछ कह नहीं पाता। तुमसे जुड़े किसी भी फैसले को मैं अकेले लेने का अधिकारी नहीं। वो मुझे एक फ़िल्म देखने और तुमसे बहुत खुलकर मन कहने और मन जानने की सलाह दे रहा था। फ़िल्म का नाम था 'मास्टर्स ऑफ सेक्स' । मैं बस चुपचाप सुनता रहा। कैसे कहें सबके प्रेम जाहिर करने का अपना तरीका है.... वो कर लेते हैं। मेरा तो तुम जानती ही हो.... पर यह तो सच है जब तुम कोई एक बहुत मामूली सी भी बात कह देती हो तो वो मैं सैकड़ों बार पढ़ता हूं सोचता हूँ। जैसे बात करते हुए कल कहा  ' निशान तो आपने भी दिए हैं जो मुझे दिखता है ' मैंने वह वाक्य अपने भीतर रिकॉर्ड कर लिया, उसे लूप पर सुन रहा हूँ। तुम्हें मेरे कौन से वाक्य लूप पर सुनाई पड़ते हैं ? ऐसा बोलती रहा करो मेरी जिंदगी हल्की हो जाती है, दूर से स्पर्श से नहीं तो शब्द से तो छुआ जा सकता है न...

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गांव पहुँचा जैसे तैसे। थकान इतनी थी कि एक एक मांसपेशी टूट रही थी। पर नीद नहीं आई। एक किताब की प्रतीक्षा खत्म हुई। भास कृत स्वप्नवासवदत्ता । 11 बजे के आसपास मिली और 4 बजे तक मैं उसे पढ़ चुका था। अदभुत है। बिल्कुल सही और सटीक कहा तुमने ' रस की जो वास्तविक अनुभूति है। सही सह वो संस्कृत साहित्य में जीवित है '  पढ़कर आनंद आ गया। तुम्हें सुनाऊंगा कभी इसका किस्सा। 



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कई शादियों में सामाजिकी निभाने जाना था, पर मन नहीं हुआ। व्यवस्था सब किया पर अंत क्षण मन नहीं हुआ नहीं गया। सुबह जाऊंगा। 9 जगह जाना है। 

सोना ठीक हैं। डुग्गु अब भूसा खाने लगे हैं। सारे पिल्ले अब इधर उधर घूमते रहते हैं। दुवार पर शांति है। गुलाब और गेंदे ख़ूब खिलें हैं। सौंफ और धनिया के फूल से सब महक रहा है। सरसों के फूल अब फल हो गए हैं। तोते मनभर उन्हें खा रहें हैं। आज मैं सोच रहा था, इस बार फिर मैं सूरजमुखी बोउँगा। कल ही। 

― 16 फरवरी 2025 / 8 : 15 शाम 

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