आज महादेव के विवाह का दिन था। आज ही के दिन उनका प्रेम जीत गया था। महादेव से सुंदर कौन प्रेमी होगा। वो खुद को आरोपित नहीं करते, पार्वती के जीवन का अतिक्रमण नहीं करते। उनका जीवन गहन अंधकार में ज्योति का जीवन है। त्याग का जीवन है। प्रकृति के पूजक है, वहीं रहते हैं। जिनका कोई घर नहीं । खंडित को मंडित करते हैं महादेव। विष पीकर सुंदर बोलते हैं। उनमें पति होने का अधिकार कम है साथी और प्रेमी सा साथ खड़े होने वाला स्वभाव अधिक है। वो वियोगी हैं। रोते हैं। अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार हैं।
इस परंपरा को ध्यान से देखे तो सर्वत्र प्रेम की जीत की ही कथा है। प्रेम की ही स्थापना है। ईश्वर प्रेम के लिए लड़ते हैं।
अजीब यह है अब सब इतना विकृत हुआ है कि प्रेम करना ही गुनाह है। प्रेमी के लिए तड़पना मजाक की बात है। जाहिर करना तो इतना शर्मनाक है कि आप भरे समाज हाथ पकड़ लें तो लोगों की आँख तन जाती है। यह काश खत्म होता। दुनिया प्रेम से भर जाती। हर आदमी महादेव हो जाए हर स्त्री पार्वती। विवाह के नाम पर जो भी डर पैदा होता है वह खत्म हो, दोनों लिंगो में साथी मिलने का उत्स हो, लोग ईमानदार हों। कामना ही कर सकते हैं। कर रहें हैं।
आज के दिन को लेकर मेरे भीतर तमाम इच्छाएँ हैं। समय सब करने का सामर्थ्य दें। साथ दे। दिन भर निर्जल व्रत रहा। शाम पूजा पाठ करके अभी जलपान लेकर बैठा हूँ। दौड़भाग रही। आज आखिरी दिन था कथा का तो भीड़ बहुत थी। लगभग 370 लोग। मन ही मन एक नाम सुमिरता रहा। माफ़ी भी माँगी विश्वनाथ भगवान महादेव से। जल्दी आने का वादा किया। अब ये वादा पूरा करना उनकी ही इच्छा पर है। आज महाकुंभ भी समाप्त हुआ। एक भी दिन नहीं जा सका। एक दिन पिताजी के साथ गया था तो नदी तक नहीं जा पाया। वो दिन तो बड़ा कठिन था। इच्छा थी। पर .. अब नहीं है। अब जाऊंगा भी नहीं। देख लिया। तबियत अब थोड़ी ठीक है। आज थकन बहुत ज्यादा है। शरीर टूट रही है। मन यहाँ बिल्कुल नहीं है। एक खीझ भरी रहती है। तनिक तनिक बात पर गुस्सा लगता रहता है। मन करता है। .... खैर !
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मैं याद किया जाना चाहता हूँ। याद करना चाहता हूँ। छुना चाहता हूँ। छुआ जाना चाहता हूं। साथ चाहता हूँ। साथ देना चाहता हूं अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ। जीना चाहता हूँ। जीने लायक बनना चाहता हूं दुनिया। बहुत कुछ नहीं चाहता। बस चाहता हूं एक साथ.. जिस साथ में मेरे साथ कि टीस को..
पिताजी घर हैं। आज शाम मन गले लगाए कुछ घड़ी बैठे रहे। वही सब पूछा जो एक पिता पूछता है। आँख भरी थी। कह रहें थे ' बेटवा हमार करिया होई गा, वइसे पातर हया और पातर होई गया' दो चार आँसू गिरे फिर सम्भाल लिए। सर दबाने लगे, फिर पैर की तरफ हाथ बढ़ाए मना कर दिया , बगल लेटे रहे। अभी गए कुछ देर पहले अब मैं डायरी के साथ बैठा हूँ.. शायद लेटा हूँ आधा।
याद.. कितना कहूँ। चुप ही रहता हूँ।
― 26 फरवरी 2025 / शाम 7 बजे
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