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कल रात मुझे ख़ुद पर खूब हँसी आयी। हँसा भी खूब। न जाने क्यूँ। मुझे चीजें इतनी स्पष्ट क्यूँ दिखती हैं। मुझे निकट दृष्टि दोष है। लेकिन मन के मामलों में यह उल्टा है मन की आँख को दूर दृष्टि दोष है, मुझे दूर का सब दिख जाता है नज़दीक का नहीं दिखता। मैं योजना अच्छी बनाता हूँ, हर कोई तीसरा उसमें अपनी बुद्धि न लगाए और जैसा कहा वैसे चले तो विफल नहीं हो सकता। पर अपने मामले में मेरी सब समझ खो जाती है। मैं डर जाता हूँ।
ख़ैर !
दिन भर दौड़भाग रही। नाना के घर भागवत है। नाना को बड़ा दावा रहता है मुझपर.. सबसे कहते फिरते हैं, ' हमका कौनो चिंता नाय न हमार बड़का नाती आय जाए बस सब होई जाए हमार' न जाने क्यूँ उन्हें लगता है, मुझमें बड़ी सूझबूझ है, मुझे लोगों से पेश आना आता है, व्यवस्था कभी बिगड़ नहीं पाती। उन्हें अपने बेटे पर उतना भरोसा नहीं रहता। जाने क्यूँ.. पूरे परिवार के लिए रूढ़ी वादी और कट्टर आदमी मेरे नाना मेरे लिए एक दम नए विचार के और भीगी आत्मा के व्यक्ति हो जाते हैं, वो मेरे कन्धे पर रो लेते हैं, मुझसे ऐसी ऐसी बात बता देते हैं जो आजतक मामा को भी नहीं पता हो..पैसे की बात हो या समाज की सब मुझे ही बताते हैं। जबसे घर हूँ , घर बस रात में सोने आ रहा हूँ दो दिनों से दिन उन्हीं के साथ बीत रहा है। जिम्मेदार होना अपने सर बवाल लेना ही है। मामा और योगेश में बिल्कुल नहीं बनती वो उसे जो मन आता है कहते रहते हैं, उनकी नज़र में वो पढ़ता लिखता नहीं न कुछ करता है, उससे प्रेम से बात करते मैंने सालों से नहीं देखा उनको, फिर वो उनकी ग़लती बताता है कहता है पिता जैसा व्यवहार ही नहीं है, कभी पूछते ही नहीं, क्या सोच रहे हो क्या चाहिए तो क्या बोलूं.. मैं दोनों के बीच में सेतु की तरह पिसता हूँ 3 सालों से यही चल रहा है, सुबह एक घटना हुई, मुझे मामा पर क्रोध आ गया, लेकिन मैं कुछ बोल नहीं सका, मेरा अधिकार नहीं बनता, लेकिन वो ग़लत थे। बच्चों से खासकर बड़े होते बच्चों से सहजता से और सौम्य होकर ही कुछ कहना और समझाना चाहिए, डाँटने पर उनके मन में क्रोध भरता है वो बागी हो जाते हैं, मन में दूरी बनती है फिर वो उम्रभर उस रिश्ते में बनी रहती है।
बड़ा भाई होना जितना सुखद होता है, उतना ही विडंबना भरा ही। भाई बहनों की नज़र में मैं बड़ा भाई हूँ मैं उनकी सब समस्या हल कर सकता हूँ, पर मैं तो और सबसे छोटा ही हूँ, आधा समय सबमें सामंजस्य बनाते बीतता है। घर चहल पहल से भरा है। कई बातों पर मन में क्रोधाग्नि भभक उठती है, पर सारा जतन करना होता है कि एक भी लपट बाहर न निकले। रिश्ते सुनकर, सहकर, प्यार से और धैर्य से ही सुंदर बनते हैं। रिश्तों में अहम लाने से अपनी बात ही सर्वोपरि करने से खटास पैदा होती है। बिल्कुल मूर्खतापूर्ण बात को मूर्खतापूर्ण न कहकर कहना पड़ता है हॉं यह विचार भी ठीक है इस तरफ भी सोचा जाएगा। पता नहीं क्यूँ मैंने आज तक जितने भी परिवार.... छोड़ो।
नाना का सारा परिवार उनके आसपास जुटा हुआ है। मेरा परिवार नहीं है.. बहने अपनी जिम्मेदारी में हैं, माँ अपनी, वो वहां पहाड़ों में.. पिताजी ऑफिस में.. मैं अकेले सबका प्रतिनिधि बना खड़ा हूँ। तुम्हारी बात होती रहती है। तुम होती तो ये. तुम होती तो वो.. परिवार के लिए तुम परिवार का सबसे जरूरी हिस्सा हो। मैं कुछ नहीं बोलता। जब जब कोई नाम लेता है लगता है जो मैं छिपाए जबरन हँसता बोलता रहता हूँ उस घाव पर नमक रख रहा हो। मैं तुम्हारे बिना जैसे तैसे खुद को समझा कर रहता हूँ, फिर यह टीस कि ' होती तो..' मन अजीब कर देता है। अच्छा है नहीं हो..होती तो मैं तुम्हें काम करते तो नहीं देख पाता। अभी जो जरूरी है वो तो कर रही हो न तुम।
मुझमें तुम इतना ज्यादा हो कि लगता है मुझमें तिहाई भाग तुम हो एक भाग मैं.. हम ऐसे एक होते हैं आधे आधे होकर नहीं।
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शाम एक खेत में ढेर सारे बगुले दिखे, दिनों बाद इतने बगुले देखकर मन हरियर हो गया। बगुले किसानों के दोस्त होते हैं, वो फसल को कीड़े मकोड़े से बचाते हैं, मिट्टी को पलटते हैं। मन मोह गया। कुछ पल वहीं खड़ा रहा गाड़ी रोककर। अदभुत दृश्य था वह..बादल में सूरज पश्चिम की तरफ है। थोड़े काले और सफेद बादलों के पीछे से जबरन अपनी रौशनी बाहर फेंक रहा है। खेत की जुताई हुई है, सम्भवतः आलू का खेत था। पूरे खेत में सैकड़ों बगुले सफेद रंग से...आह वह दृश्य।
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पिताजी बहुत समाजिक नहीं है। ज्यादातर मुझे रोकते रहते हैं, यहाँ न जाओ, छोड़ दो। कहीं कोई स्वर्गवासी हो या किसी का विवाह हो वो मुश्किल ही जाते। मैं ही जाता।
अब मैं चाहता हूं यह सामाजिकता कम हो तो वो अब बाबा की तरह होते जा रहे हैं, मैं नहीं जाना चाहता तो कहते हैं बचाए रखना है भईया.. चले जाओ 5 मिनट को ही, ख़ुद भी कोई बीमार हो एडमिट हो तो अब चले जाते हैं। इस बात का क्या मतलब है पता नहीं। मगर यूँ ही यह बात कल शाम पर पापा की एक बात के बाद से चल रही है मन में।
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कुछ पढ़ नहीं पाया हूँ। किताब तक नहीं खोला हूँ। सोने से पहले कुछ देखकर सोऊंगा। और भी कल की कुछ उम्मीद भी नहीं पूरी हुई। कल देखते हैं। यूँ तो मुश्किल ही है मगर देखो...
― 18 फरवरी 2025 / 7 : 45 शाम
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