सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

Ashutosh Prasidha लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिन-विषयक

मन क्या चाहता है अगर यह तय कर पाना इतना ही आसान होता तो मन होता ही नहीं। कुछ और होता जो मन का वो काम करता जो मन बहुत सोच विचार करके करता है। स्थिर। एकलीक। बस मन का।  आप क्या चुनते अगर आपको लोक मर्यादा और मन के जीवन में से एक चुनना हो ? आ हाँ ... रुको फिर से सोचो ! हड़बड़ी में नहीं, मन भर सोच लो। फिर जवाब दो। कैसे निकलोगे रोज घर से बाहर ? कैसे नज़र मिलोगे माँ बाप से.? क्या बस खुद से नज़र मिला लेने से ही सब ठीक हो जाता है ? नहीं ! कभी नहीं, यह सम्भव ही नहीं। अपने से ज्यादा अपनो का जीवन महत्वपूर्ण होता है। ऐसी जगहों पर हम मर ही जाते हैं। मर ही जाना चाहिए। जीने के लिए जरूरी है। मर जाना।  हरारत। बुखार। दो चार बार उल्टी। आँख से पानी भी। सुबह से 4 टेबलेट खा चुका हूँ। अब राहत है।मन में असफलता का बोझ। खुद से  दो चार कठिन सवाल। मन में बेवजह बवाल। अपने ही सिर के खींचते रहा बाल। जीने की लालसा में क्या कर लिया है हाल। काश! बनारस ही किसी घाट पड़ा होता । उलटते पलटते बीती रात। मगर.. ख़ैर.. यह भी भला है कोई काम की बात।  काम की बात ?  ― 23 फरवरी 2025 / 7:30 शाम 

दिन विषयक

मैं इतना गुस्सा क्यूँ करता हूँ ? किस बात की चिढ़ है मुझमें ? यह मुझे क्यूँ नहीं स्वीकार होता है कि जिसे मैं अपना सबसे करीबी मानता हूँ उसका कोई और करीबी हो सकता है। उसकी योजनाओं में नहीं भी हो सकता हूँ मैं। मैं कहीं नहीं हो सकता..मैं क्यूँ चाहता हूँ कि वो बस मुझे महत्वपूर्ण माने.. यह गलत बात है।  मैं कभी कभी बातचीत के दौरान ऐसे शब्दयुग्म इस्तेमाल कर जाता हूँ जिसके लिए फिर महीनों पछतावा होता है। मैं नहीं समझ पा रहा ऐसा क्यूँ हो रहा है। मैं जानता हूँ आसावधानी से बोला गया एक शब्द हमारी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। बहुत करीबी का भी मन दुखा देता है, फिर मैं क्यूँ नहीं छोड़ पा रहा हूँ इसे...  मुझे बहुत स्थिर और व्यवस्थित होने की जरूरत है। मुझे चुप रहने की जरूरत है। मैं कहीं दूर निकल जाना चाहता हूँ घूमने... मगर कैसे ? न जेब में धन है न साथ जाने वाले का मन  *************  रिश्ते ख़ालिस भावनात्मक होते हैं, वो मन से चलते हैं , वहाँ बुद्धि लगाने पर सब चौपट हो जाता है।  *************  कल रात नींद नहीं आई। आँसू रह रह कर आते रहे। बीते दिनों की याद आती रही, पिछले वर्ष...

अ-धार्मिक लोगों की धार्मिक भीड़

हम अपना हृदय शब्दों के सहयोग से दर्पण की तरह खोलकर रख देते हैं, वो हूबहू तो नहीं मगर मन के आसपास तक पहुँचता हुआ लगता है, जिससे कहना है उसे कह देते हैं, फिर जब वो उन पीड़ाओं से दुःखी हो उठता है तो भीतर से ग्लानि पनपती है, अपने ही ऊपर क्रोध फूटता है, मन कितना अजीब होता है न ? वह चाहता है कि उसका प्रिय यह भी जाने उसके पीछे छूटा व्यक्ति उसे कैसे याद कर रहा है उसकी अनुपस्थिति को कैसे जी रहा है, उल्टा यह भी चाहता है कि उसका प्रिय हमेशा हँसता रहे उसे तनिक भी दुःख न हो, दुःख शब्द का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए उसके जीवन से..पर यह दुःख है की वह हमेशा किसी न किसी के सहारे चिपका रहता है, दुःख परजीवी है, वह अपने जीवन के लिए हमारा जीवन खाता है धीरे धीरे हम रोते है तो आँसू वही पीता है और बढ़ता रहता भीतर.. ऐसे लोग कितने किस्मत वाले हैं जिनके लिए कहीं कोई राह देख रहा है, जिनके लिए कोई मन सोच रहा है, वो कैसे होंगे जिन्हें कोई सोचता ही नहीं होगा, ऐसे लोग तो होंगे ही न जीवन में ? मन को मनभर कह जाने के बाद लगता है क्या मैं ही इतना सोचता हूँ, इतनी भावनाओं का जवाब केवल चुप्पी कैसे हो सकती है? बोल जाने के बाद लगता...

याद नहीं रहने की याद

अपने को भूलकर ही अपनों के बीच जिया जा सकता है। मैं जानता हूँ इस वाक्य के बाद आपके पास कई तर्क होंगे, जैसे सबसे सस्ता वाला होगा कि अपने जो होंगे वो आपको भूलने ही नहीं देंगे की आप क्या हैं, पर मेरा भरोसा कीजिए आप एक दिन इसी वाक्य के साथ सबसे बुरी तरह परास्त होंगे उस दिन आपको यह आभास होगा कि हर दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के साथ मस्त है, आप की अनुपस्थिति कहीं खटक नहीं रही है, हर व्यक्ति की अनुपस्थिति को भरने के लिए कोई न कोई उपस्थित है। दरअसल मामला सबसे सरल यह है कि आप समझें जिसके जीवन में बहुत करीबी हैं, उसके लिए कोई भी करीबी नहीं है, सब एक निमित्त मात्र हैं, जब जो जरूरत होगी वह करीबी होगा, फिर उस करीबी के जीवन में क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता... कई उदाहरण हैं  मगर ख़ैर छोड़िए.. ************ जबसे जन्म हुआ है, जीवन यहीं जन्मभूमि से 150 किलोमीटर के दायरे में सिमट गया है। कभी कहीं बाहर गया भी तो मजबूरन या परीक्षा के सिलसिले में, बाहर जाने का मन करता रहा पर मन ही बाहर गया मैं न अभी हरिद्वार जा सका, न उज्जैन, न दक्षिण में कहीं जा पाया , न मध्य में, न पूर्व में ही कहीं, केदारन...

मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर

कभी कभी मन में यह भाव क्यूँ आता है कि चलो हम कुछ दिन वह सब छोड़कर देखते हैं, वह सब जो हम निरंतर करते हैं अपने आसपास के लोगों के लिए। हम पहल करना रोकते हैं, हम संवाद रोकते हैं, हम हमेशा खड़े रहने की प्रवृत्ति को रोकते हैं, हाल चाल लेते रहने की आदत को रोकते हैं, रोकते हैं कि हमारे रोकने के बाद कौन हमसे पूछता है कौन पहले पहल करता है कौन उस समय पर आकर कहता है 'अरे आप नहीं आए तो हम चले आए'  क्यूँ आता है यह विचार ? जबकि यह तय है कि पलटकर कोई नहीं करने वाला पहल, सबकी अपनी व्यस्तता है, सबकी अपनी प्राथमिकता आप हँस कर कह देंगे तो जवाब भी आप पर ही लादकर दिया जाएगा। कारण क्या है इसका ? ऐसे सम्बन्धों का अर्थ क्या है ? सच में जानना यह चाहता हूँ ऐसे लोगों पर भावनाओं को ख़र्चने का क्या अर्थ ?   जब दो जीवन के बीच वैसा चुम्बकत्व न हो जैसे होना चाहिए तो अपने जीवन को दूसरे जीवन से किनारे कर लेना ही उचित होता है। एकतरफा एफर्ट करता व्यक्ति हमेशा हृदयाघात से मरता है। यह सामान्यीकरण नहीं है, बस विचार है जिसे लक्षणा में समझने की जरूरत है।  ************ दिन ब दिन लिखे जा रहे साहित्यि...

क्या जीवन केवल द्वंद्व है ?

छोड़ देने से चीजें छूट जाती हैं। क्या यह सही है ? नहीं! छोड़ते जाने से चीजें छूट जाती हैं। वैसे ही जैसे रांझणा फ़िल्म में कुंदन ने डॉक्टरों द्वारा ज़बरन खींची गई साँस को  छोड़ दिया था, वैसे जैसे गाइड में देवानन्द ने अपने को छोड़ दिया था और वैसे ही जैसे मसान में देवी ने अपने भूत को छोड़ दिया था। छूटना और जुड़ना सब कुछ ऐसे ही होता है। होने की इच्छा हो तो हो जाता है। जैसे जिसके लिए तड़प हो उसके लिए समय निकल आता है।  कभी कभी जब कोई बहुत करीबी कहता है 'समय ही नहीं निकल पाया' तो इस बात को मैं सोचता हूँ कि समय कहाँ घुसा रहता है जो निकल ही नहीं पाता, समय का अपना मन कैसे हो गया ? समय तो हमारी ही बनाई घड़ी से चलता है न ? तो फिर कैसे ? लोग सच सच क्यूँ नहीं कह देते मन में मिलने की वह तीव्रता नहीं थी जैसे दूसरों से होती हैं, जिनके लिए समय गिना ही नहीं जाता। हम वही भूल जाते हैं, हम वही छोड़ देते हैं, और हम वहीं समय नहीं निकाल पाते हैं जहाँ हम चाहते नहीं हैं। हाईस्कूल में अंग्रेजी की किताब में एक चैप्टर था 'द फॉरगेटेन' उसमें जो सिद्धांत था वह यही था।  ख़ैर इसे भी यहीं छोड़ देते हैं खींचकर लम्बा लि...