हम बने बनाए खाँचे में फिट होने के आदी हैं। हम नया कुछ बनाना नहीं चाहते हैं। कोई बनाता दिख जाता है तो प्रयास करते हैं न बना पाए। हम सब ऊब से भरा जीवन जी रहें हैं। इसीलिए जी रहें हैं कि पैदा हो गए हैं। पैदा इसीलिए हो गए हैं कि हमारे माँ बाप पर उनके माँ बाप का दबाव था। हम सब बेमकसद पैदा हुई औलादें हैं। जिनका ठीक ठीक कोई मकसद नहीं है। अगर है भी तो अपने से पहले या अपने आसपास पैदा हुए लोगों से प्रतिस्पर्धा करना। उन्होंने ऐसा जीवन जी लिया, उन्होंने ये कर लिया, उन्होंने ये ले लिया, उनके बच्चे यहाँ पढ़ रहें हैं। दृश्य अदृश्य इतने दबाव हैं कि हम बढ़ने से पहले दब जाते हैं और बौने हो जाते हैं। बौना होना ही हमारी नियति है। ************* सुबह सुबह जे सुशील की एक किताब पढ़ी, 'दुःख की दुनिया भीतर है' जो उनका उनके पिता की स्मृति लेखा है। भावनाओं की नदी बहती है पढ़ते हुए। हम रक्तसम्बन्धीयों की बातों पर भावुक हो भी जातें हैं। उन पर बहुत कुछ बोलना चाहकर भी नहीं बोल पाते, हम उनके प्रति कृतघ्न होते हैं। किस बात के पता नहीं ? क्या केवल इस बात के कि उन्होंने हमें जन्म दिया ? वहाँ हम कहाँ फसे हुए ...