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इस राह में जो सब पे गुजरती है वो गुजरी

अपना तमाम जीवन निचोड़कर भी वह नहीं हो पा रहा हूँ जो होने का सपना बुनता हूँ। सिर्फ़ सपना ही नहीं बुनता अपने सामर्थ्य से बढ़कर श्रम करता हूँ। पिछले 15 सालों से नहीं जानता हूँ अपने लिए जीना किसे कहते हैं, अपने आप से पहले जुड़े लोगों का सोचा उम्र से कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, मैं नहीं जानता बचपना कुछ होता है, या बैचलर जैसी ज़िंदगी होती है, हमेशा लगा मैं जिम्मेदार हूँ, यह मुझमें किसी ने भरा नहीं या न जाने कैसे आ गया, बहनों को बेटियों की तरह महसूस किया, प्रेम किया तो अपने कहे से अधिक जिम्मेदार हो गया , प्रेमी की तरह कभी जिया ही नहीं, मन मारने की ट्रेनिंग मैं वर्षों से ले रहा हूँ।  मुझे मांगना और मरना एक जैसा लगता है मगर प्रेम माँगा .. हाँ माँगा। मैंने उसी एक स्त्री से कुछ माँगा.. उसने अपने भीतर का डर तोड़पर मुझे स्वीकार किया। मगर समाज हमारे गले पड़ा रहा, सच्चाई, और पवित्रता जैसी दो-मुँही तलवार हमेशा हमारे बीच लटकी रही, हम गले भी लगे तो अगले ही पल एक दूसरे से दूर को गए की पवित्रता न भंग हो जाए, हम अपने परिवार की दृष्टि में झूठे न हो जाएं.. जबकि यह बस हमारा व्यक्तिगत चुनाव होना चा...

Some open pages and returning thoughts

कितना मुश्किल है हाथ फैलाना ! उससे भी मुश्किल है खुले हुए हाथ पर लगाम लगाना, सोचते ही कुछ भी पा लेने और भविष्य की चिंता को जो होगा देखा जाएगा जैसे वाक्यों से धकिया कर वर्तमान को जी लेने लिए की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना। आत्मचेतस व्यक्ति हमें बस दूर से लुभावने लगते हैं जब हम उनके करीब जाते हैं तो समझ पाते हैं कि इस प्रसन्न और स्थिर मुख के पीछे कितनी छटपटाहट और अकुलाहट को दबाकर खड़ा हुआ मन है। यह राह बड़ी कठिन है। इस पर चलकर हम न चाहते हुए भी अपने प्रियजनों को कष्ट देते हैं।  बीते दिनों 27 वर्ष के जीवन में पहली बार पिताजी का भेजा पैसा वापस कर दिया, उन्होंने कई बार कहा क्यूँ वापस कर दिया ? क्यूँ वापस कर दिया ? रखे रहो। उस क्यूँ का जवाब है मेरे पास मगर वह समझ नहीं पाएंगे, वह हमेशा पिता की तरह सोचेंगे, या शायद मैं न समझ पा रहा होऊं क्योंकि मैं बेटे की तरह ही सोचूँगा। बड़ी बहन की शादी के बाद मैंने सोचा लिया था अब अपना बोझ पिताजी से हटा लेना है, पर कुछ कारणवश और अपनी अरामफहमी के चलते भूल गया, इस बार नही, दीदी की शादी के बाद से हर रोज़ लगता है जैसे मेरे कन्धे थोड़े और भारी हो गए हैं, उनके रहते म...