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अ-लक्षित सा कुछ

◆ जमा-दारी विस्मय, ऊब, खुशी, उदासी, थकन, अ-सम्भव, अर्वाचीन, आत्मीय, साथ, स्पर्श, भरोसा, आँख, पाँव, बारिश, महादेव, गंगा, अनादि, भीड़, हॉर्न, लूटपाट, पान, काशी, नागरी प्रचारिणी सभा, भव्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बनारसी दास, साजन मिश्र, सुमन केशरी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिवंश, पूर्वायन चटर्जी,  बद्री नारायण, पंडित कुमार बोस, व्योमेश शुक्ल,  आदि आदि,  सुख, अनुभूति, निश्चिंतता, सगाई, परिवार, नेपथ्य, घबराहट, वापसी, गायब.. कुल यही सब है जीवन में इन दिनों। जिसे विस्तार देने का मन नहीं है। बस इतना कहा जा सकता है कि बहुत कुछ बस स्वीकार करना चाहिए कहना नहीं।  कुछ कुछ शब्द लिखना था पर लिखा एक पूरा वाक्य। कुछ कुछ शब्द में क्या हमेशा कुछ कुछ छूट जाता है ? या हम बस कुछ कुछ ही कह पाते हैं ? इसका ठीक उत्तर क्या है ? हमारे आसपास कहीं भी अल्प, उप, और अर्द्धविराम नहीं है। हम प्रश्नवाचक चिन्ह और पूर्णविराम के बीच घूम रहें हैं। कभी कभी विस्मयादिबोधक चिन्ह से भिड़ंत हो जाती है। और हम वहां भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देते हैं। हम पूर्णविराम और प्रश्नवाचक चिन्ह एक...

कह देने भर के लिए न कहते हुए..

इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है।  इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे।  इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल  मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...

बीते दिन की बात

बीते हुए दिनों को बीते हुए दिनों की तरह याद करता हूँ और सोचता हूँ क्या बीतते दिनों के साथ भी ऐसे ही याद कर पाउँगा बीते दिनों को.. देख पाऊँगा की पिछले, उसके पिछले और उसके पिछले साल क्या क्या कहा और किया था आज के दिन। अगर मिटाए और डिलीट न किए जाए तो अब किसी की जीवनी लिखना पहले से ज्यादा आसान काम है। चैट उसकी डायरी है जहाँ वो निर्वस्त्र भी है और सजा धजा भी, वहीं उसकी पनीली आँख भी है और गर्व से चमकदार भी, वो वहीं किसी से रोया गिड़गिड़ाया है, किसी को धमकाया भी है।  लगभग बीत चुके की याद बीत चुके की तरह नहीं ग्लानि की तरह आती है।  आज का दिन भी किसी दिन के लिए बीता हुआ दिन हो गया। ऊबते ऊँघते और पसीना पोछते बीता दिन। कुछ रचनात्कम नहीं, कुछ विशेष नहीं, बस बीत गया। भीतर कोई इंतज़ार चलता रहा और ख़ुद से ही सवाल करते जवाब देते समझते समझाते बीत गया। बीत जाना ही था।  ढ़ेर सारी किताबें देख रखी थीं इकट्ठा कर रखी थी ये ले लूँगा पर सब... अब जो कुछ कहीं से जुड़ता जुहाता है, घर में या घर के लिए हो जाता है। एक चश्मा बनवाना है जो जनवरी में हुए एक्सीडेंट में टूट गया था, तबसे यूँ ही टालते हुए टल रहा है,...

वही जिसे कम सोचता हूँ ।

वो सभी लोग जिनके कई चेहरे थे, मैं उन सबको अपने एक चेहरे से देखने का आदी था। वो हर बार मुझे मूर्ख करार करते और निकल जाते। ज्यादातर उनके हर वाक्य के बाद मेरे पास विस्मयादिबोधक चिन्ह लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचता। उसके बाद मैं ख़ोजता रहता, काश कोई ऐसा वाक्य पकड़ में आता जिसके बाद मैं पूर्णविराम लगा पाता और अपने को कुछ और सोचने में प्रवृत्त कर पाउँ .. पर यह सम्भव ही नहीं हो पाता। मैं हमेशा पूर्णविराम की खोज में रहा पर मुझे हमेशा मिला विस्मयादिबोधक चिन्ह ! ******** क्या मैं हर जगह बस फेल होने के लिए बना हूँ ? दिलासे के अतिरिक्त कोई लॉजिकल जवाब है जिसके बाद मैं बस स्थिर हो उस जवाब को क्रियान्वित करने की तरफ बढ़ता और कुछ समय बाद जवाब देने वाले को कह पाता.. 'शुक्रिया आपके जवाब ने मुझे ढ़ेरों सवालों से बचा लिया' दरअसल है ही ऐसा एक सही उत्तर हज़ारों प्रश्नों से हमें बचा लेता है। जैसे अभी मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ वह ठीक ठीक नहीं मिल रहा है। जिस भी क्षण मिल जाएगा कलम ठहर जाएगी।  ******** हर दो लोग के बीच एक तीसरा आदमी है। जो पहले आदमी की असुरक्षा का कारण है। पहले आदमी की सोच मे...

आभास का अभ्यास

अकेले रहना हज़ार साँपों के बीच रहने जैसा है। सब कुछ है पर लगता है कुछ भी नहीं है। जिन चीजों के लिए उत्साह से भरा रहता था उनसब चीजों से विकर्षण और उब होती है। गुस्सा आता रहता है। सुबह उठकर घूमना शुरू कर दिया है। सही से खा पी रहा हूँ। सो भी जाता हूँ। पढ़ना भी हो रहा है। कुछ आर्थिक जरूरतों के लिए काम भी लिया है कर रहा हूँ। पर भीतर अजीब सी स्थिति रहती है। कुछ लिख नहीं पा रहा। दिन दिन भर कोई ऐसी आवाज से पाला नहीं पड़ता जिसके लिए जीवन जीना चाहता हूँ। सब मेरे लिए खड़े हैं। फिर भी न जाने क्या है जो बस है । शायद रचनात्मक बेचैनी इसे ही कहते हों। अगर मुझ जैसे कीड़े से आदमी में इतनी उथपुथल है तो जो रोज आदमियों को बना रहा, मार रहा है, दिन दिन अपना क्षरण देख कर भी सब दिए जा रहा है वह कितना बेचैन रहता होगा। ईश्वर बेचैनी का दूसरा नाम तो नहीं है ? उनकी पत्नियाँ उन्हें कैसे सही करती होंगी। उन्हें तो लगता हो न यह सब उनकी किसी कमी की वजह से है। यह सामान्य है हम जिससे प्यार करते हैं उसकी हर मानसिक स्थिति का दोषी खुद ही को मानने लगते हैं। हम बार बार पूछते हैं तुम ठीक तो हो न ? भले ही वो कुछ न बोले पर उस शांति को...

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन

कामनाओं की अति आदमी को आलसी कर देता है, वह एक ख़्याली दुनिया में रहने लगता है। वहाँ रहना घातक है। यूँ ही रचनात्मकता आदमी को मानसिक रूप से जितना चलायमान बनाता है, शारीरिक रूप से उससे कहीं अधिक आलसी बना देती है। मुझे जब जब घेरती हैं कामनाएं लिखता हूँ फाड़ देता हूँ। मैं इससे अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता अपने मन के प्रति। इच्छाओं को लिखकर फाड़ देना, खुद को थोड़ा थोड़ा फाड़ना है। यह भावनाएं नहीं है.. इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ होंगी तो हम चाहेंगे उन्हें कोई या जिससे वह इच्छा है वह उसे पूरा करे। हम किसी पर हावी होंगे। या खुद बेचैन रहेंगे और जब खुद बेचैन रहेंगे तो खुद से जुड़े लोगों को सुकून कैसे देंगे भला। बेहतर है कम से कम इच्छाओं का प्रकटीकरण हो। उन्हें भीतर ही भीतर काटते छांटते रहिए। भावनाएं अति वैयक्तिक होती हैं। और बहुत निजी। यह जिसके लिए होतीं हैं उससे साफ सपाट कह देना चाहिए। यह बोझ नहीं बनता, न बनाता है। हाँ भावनाओं को कहना भर हो उसे थोपना नहीं। ज्यादातर तो हम उन्हें वैसे का वैसे बता या जता नहीं पाते जैसे वह होती हैं। भावुक आदमी के बोलने के दो ही साधन हैं या तो आँसू या चुप्पी। मेरे पास द...

खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

फिसलन

कितना और कब तक किया जा सकता है एफर्ट ? कोई तो सीमा होती होगी या बस जीवन एफर्ट करते बीत जाएगा। मुझे बहुत की इच्छा नहीं है पर जितनी है उतनी तो मिले उसमें भी कम कर दिया जाएगा तो फिर बचेगा क्या ? फिर तो चाहिए ही नहीं। मैं बिल्कुल उसी ख़्याल का हूँ कि 'हम तो पूरा का पूरा लेंगे जीवन' अगर चाहिए तो सही से चाहिए वगरना चाहिए ही नहीं। हर चीज की थोड़ी थोड़ी आवश्यकता है, थोड़ी मन की, थोड़ी देह की, थोड़ी ही आत्मा की, जीवन की भी बहुत थोड़ी ही, उसमें समझौता नहीं कर पाऊंगा मैं,  कह दो नहीं मिलेगा मैं छोड़ दूँगा, पर यह तनिक नहीं मानता मैं की थोड़ा सा ले लो, थोड़ा सा ही तो चाहिए, थोड़े का थोड़ा क्या होता है कुछ भी नहीं.. पता नहीं क्या चाहता हूँ मगर जो कुछ चाहता हूँ वैसा ही चाहता हूं जैसा सोचता हूँ। पूर्ण ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और पूर्ण निष्ठा के साथ..  दिन इधर उधर करते, कुछ पढ़ते, कुछ लिखा हुआ ठीक करते बीता। सुबह से शाम तक एक बात नहीं लगातर बस चुप्पी। एक याद घेरे रही, मन करता रहा कि जाऊँ फिर सोचा नहीं, इंतज़ार कर लेते हैं, वो जब खुद आता है तो मन से आता है।  न जाने क्यूँ आज मुझे ख़ूब रोना आया। भीतर अजीब सा...

मन का मस्तिष्क

सुबह बहुत जल्दी उठ गया था। वही सब किया जो हर कोई रोज करता है। किताबें सही की और फिर दण्डी कृत दशकुमारचरित शुरू किया। कुल 80 पृष्ठ पढ़े। अभी 45 बचे हैं। कहते हैं संस्कृत गद्य अपने प्रारंभिक रूप में यजुर्वेद में ही मिलता है। उपनिषद और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी उसकी परिपाटी चलती रही है। दशकुमारचरित में दस कुमारों के चरित्र का वर्णन है। जुआ चोरी व्यभिचार धोखा हत्या बेईमानी कामुकता अकाल अच्छा और बुरा राजा सब पर खुलकर और निर्मम होकर लिखा गया है। हर प्रेम कहानी का मूल यूँ लगता है कामाग्नि का भड़कना ही है। दण्डी यहाँ तक जाते हैं कि उनकी स्त्री पात्र खुद कहती हैं ' मुझसे संभोग करो,और मेरी काम पीड़ा मिटाओ'। मतलब यह की स्त्रियां अपनी हर इच्छा पर मुखर हैं कहीं दबी नहीं हैं। जो चाहती हैं कहती हैं। शास्त्रार्थ करती हैं। बहुपत्नी प्रथा है। लगभग समर्थन भी करता है कवि। विवाह से पहले पुरूष स्त्री को सम्भोग के लिए ले जाता है। सिद्धों की खूब चर्चा है, लगभग लोग अंध विश्वास में धंसे हुए हैं। देवता का कोई प्रत्यक्ष बात नहीं है पर उनकी आड़ ली जाती है। अजीब है सब। पर ठीक है.. अपने युग का नग्न यथार्थ कहती रच...

सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

तरह तरह की बात है। हर मुद्दे पर, हर विचार पर विचार है। हर क्रिया के लिए है हमारे पास प्रतिक्रिया, मगर अपनी बात करनी हो तो सब विचार, सारा खुलापन, सारी कल्पना शक्ति वाक्पटुता सब न जाने कहाँ गुम हो जाता है। सब कुछ है मगर जैसे कुछ नहीं है, मन कहने से पहले सोचना पड़ता है इसे कहने के बाद क्या समझा जाऊँगा? यह सोचते ही यह भी सोचता हूँ कि क्या यह उचित है ? जवाब ही नहीं मिलता। एक संकोच लिए घूमता रहता हूँ, जो कहना चाहता हूँ कह नहीं पाता, मान लो कभी कह भी दिया तो क्या शर्त है कि वह पूरा होगा, उलट गलत समझ लिया गया तो। मैं यही सब सोचते हुए यह भी सोचता हूँ कि जिस भी रिश्ते में इतना सोचना पड़े उस रिश्ते की बुनियाद क्या मजबूत है ? जवाब नहीं में ही मिलता है। बुनियाद मजबूत कैसे होगी ? वैसे ही रहने से जैसे हम हैं, वही कहने, बोलने और दिखने से जो हम कहना चाहते हैं, समान्य रूप में बोलते हैं और जैसे असल रूप में दिखते हैं.. परिवार हो या प्यार अगर आप खुलकर मन नहीं कह पा रहे तो मन से वहाँ हैं ही नहीं.. * कितना कुछ अर्थपूर्ण दिखकर बे-अर्थ है और कितना कुछ बेअर्थ दिखकर है अर्थपूर्ण। सोचने की स...

लगभग तय

कल दिनभर दौड़भाग करने और खाना परोसने खिलाने में निकल गया। रात देर से आया यही कोई 12 के क़रीब। भीड़ में भीड़ की तरह मन दबाए दौड़ते रहने के बाद जब हम अकेले होते हैं तो सब दबाया फूट पड़ता है। अपने आप से सामना होता है। फिर बचता है समर्पित हो जाने के। जुड़े हर व्यक्ति की दिनचर्या है, उसमें हस्तक्षेप भी ठीक नहीं है। पिताजी न जाने क्यूँ बड़े हताश से थे। अपनों की भीड़ में भी जब गैरों से बात करना पड़े तो और क्या ही होगा। ख़ैर! .. डायरी खोलकर बैठा न जाने दिनभर का सोचा विचारा लिखा। नींद देर तक नहीं आई। बिस्तर पर कई तरफ से लेटकर देखा। थोड़ी देर जमीन पर लेटा रहा। सुबह देर से उठा। रात देर से लगभग सोने जैसा ही सोया भी था। देर से सोना और देर उठना कितना अपराधबोध भर देता है न हमारे भीतर ! फोन में तस्वीर देखता बिस्तर पर एक कोने कुछ घड़ी बैठा रहा। पिताजी की फटकार सुना तो वहाँ से उठा । कुछ घड़ी बालकनी में गमले देखा। कभी कभी सोचता हूँ हम कितने पापी हैं जिसकी पूरी पृथ्वी है उसे अंजुरी भर मिट्टी में समेट दिया है। अपने साथ भी तो हम यही कर रहे हैं। इधर उधर कुछ घड़ी किया, गुनगुना पानी पिया। नहाया। ब्रेड ले आया था उसे सेंक ल...
स्मृति की कचोट। झूठी हँसी की ओट ले छिपाता रहा आसूँ । जाने कैसा दिन बस बीत गया।  ― 24 मार्च 2025 / 9:15 रात

तुम अपने चरणों में रख लो मुझको

निर्वासन सा महसूस होता रहता है। कहाँ से ? यह पता नहीं। मगर लगता है कहीं हूँ ही नहीं। जिस परिवार के लिए जूझता रहा, अपने को खपा दिया, वहीं मुझसे कोई बातचीत ही नहीं है। सूचनाएं दुसरो से मिलती हैं। लगभग रोज फोन करूँ तो बात हो न करूं तो पलट के कोई पूछता तक नहीं। मैं देर तक निहारता रहता हूँ राह, कोई पुकारे , कोई कभी तो कहे कि .... ख़ैर.. यह स्वीकार करना कितना कष्टकारी है कि धीरे धीरे अपने भाई बहन भी पड़ोसी बन जाते हैं। अनन्तः आपका कौन है आपकी माँ और बीबी के सिवा.. ? वो भी एक दिन नहीं पूछें तो कोई अचरज नहीं होगा।   मेरे भीतर कल्पनाओं का एक संसार है, जहाँ मैं अपनी रचनात्मक उठापटक के साथ रहता हूँ। मुझमें घनघोर कामना है। वासना नहीं है। है भी तो वह उसी की है जिसके लिए होनी चाहिए। मैं घण्टों चुप रहता हूँ, कम बोलता हूं , बाहर लोगों से इंटरैक्ट नहीं हो पाता इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मैं आ अकेले रहना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि कोई है को महसूता रहूँ और रहूँ। मैं रहने की तरह रहना चाहता हूँ। अतिक्रमण की तरह नहीं। मैं जीने की तरह जीना चाहता हूँ मरते रहने की तरह नहीं।  *  ...

मन के द्वारे

कभी कभी हम बोलते हुए ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो हम अपने भीतर इसलिए छिपाते रहते हैं की कोई हमारा वह असली रूप न देख ले और उसका ग़लत फायदा उठाए। हम अपने लिए नहीं अपनी उस भावना के लिए डरते हैं जो भीतर है। वह निरी भावुकता नहीं होती। वह शुद्ध भावना होती है। जिससे मुझे प्यार हुआ मैं उसके सामने बिल्कुल निर्वस्त्र होकर खड़ा हो गया। इस विचार को छोड़कर कि वह क्या सोचेगा क्या कहेगा। मन खोलना देह खोलने से ज्यादा कठिन है।मन देना देह देने से ज्यादा असुरक्षा भरा। मैं सब दे चुका।  'मेरा मुझमें कुछ नहीं.. ' * मेरा घर बीमार। मैं भी बीमार ही.. कोई कहीं दूर दिन भर पड़ा रहा मैं उसे सोचता विचारता खड़ा रहा।  * धूल,बालू ,तेज धूप, श्राद्ध, सूखता गला, साफ गाल, घण्टों की मशक्कत, महापात्रों का मान मनौवल। लौटना और बस लोट जाने सा मन। हल्का नाश्ता, ज्यादा उल्टी, थोड़ी देर बिटिया से खेलना। फिर पड़ जाना। * एक लंबी चिट्ठी लिखता हूँ, उसे बार बार पढ़ता हूँ और जब जब पढ़ता हूँ सोचता हूँ इसे अभी एक बार और पढूँगा अगर मैं नहीं रोया तो भेज दूँगा। * सर पर अपने ही कठोर हाथों से तेल मालिश कर रहा था, और आँख बंद कर महसूस ...

जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

सुबह सुबह बारिश हुई। उठकर बाहर टहलता रहा। पेड़ पौधों पर जमी धूल साफ हुई। बौर धूल गए। हवा थोड़ी ठंडी हुई । मार्च ही में जो जून सा माहौल है कुछ हल्का हुआ। मैं देर तक बैठा रहा। राग रामकली सुनता रहा। मुझे बारिश बहुत पसंद है। न जाने क्यूँ  ख़ूब सूखे पत्ते गिरे हैं। अब उठता हूँ पर कोई है नहीं जिसे दे सकूँ। अपने आप को आप कुछ नहीं दे सकते सिवा दिलासा के।  एक कहानी पढ़ी अमरकांत की 'मौत का नगर' । जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि पर है। कथ्य अच्छा है, शिल्प भी अच्छा है पर कहानी कमजोर है। कुहासा कहानी पढ़ी है अमरकांत जी की और भी बीसियों कहानी पढ़ी है। अमरकांत जी के भीतर के कहानीकार का फ्लेक्चुएशन  होता रहता है । कभी कभी यूँ लगता है वह लिखने कुछ और बैठे थे लिख गयी कहानी, या उन्हें लग गया यह कहानी है तो उसे जहाँ लगा कामभर का हो गया वही छोड़ दिया। इनकी कहानी इंटरव्यू,  गले की जंजीर, ज़िंदगी और जोंक, फ़र्क, कबड्डी, यह अलग टेस्ट की कहानी हैं। ख़ैर ! मैं ग़लत हो सकता हूँ। मगर यह मेरा अपना अनुभव है।  दिन भर इधर उधर न जाने क्या किया। कुछ काम किया कुछ पढ़ा। साहित्य इतिहास के लगभग 30 पन्ने प...

रौंदे हुए फूल

मुझे कहीं जाना हो या किसी करीबी को कहीं से आना हो मुझे नींद नहीं लगती। लाख जतन कर लूं नहीं आती नींद। अनगिन कल्पनाओं से भरा रहता है मन।  एक पल को स्थिर नहीं होता। भीतर कल्पनाओं के भवन बनते ढहते रहते हैं। मैं उसी कशमकश में जागता रहता हूँ। मैं धीरे धीरे करके बहुत कुछ टालना सीख गया मगर अपने भीतर का यह कशमकश नहीं टाल पाता। यूँ लगता है जैसे कल्पना कोई नदी है, तेज बहती नदी, जिसके किनारे पर ही मेरा चप्पू टूट जाता है और मैं फिर अनियंत्रित बहता रहता हूँ। बहता रहा रात भर। सुबह 4 बजे मम्मी नाश्ता बनाईं। कमरे में सब समेटा और निकल पड़ा। खाली हाथ गया था । फिर भी लौटते हुए सामान हो गया डिक्की भरकर। सोना का पैर छूने गया तो वो अपना मुँह फैला ली आगे पैर की सीध में.. उन्हें जब प्यार आता है तो ऐसे ही करती हैं बचपन से।  इन दिनों लगता है जैसे शरीर ऊर्जाहीन होती जा रही है। पहले बाइक चलाने पर थकान नहीं लगती थी अब लगती है। कन्धा और रीढ़ की हड्डी लग रहा था निकल जाएगी। पर ठीक है। पहुँचा सबसे हालचाल लिया। धूल झाड़े। पुराने पड़े कपड़े कुछ कागज़ कुछ और स्मृति सब जला दिया। पता नहीं क्यूँ भी...

फिर वही रात है

वही दिनचर्या। वैसा ही दिन । वैसी ही रात। दिनभर झकोर चलता रहा। मन हिलता रहा। कभी कभी लगता है जैसे ज़िन्दगी लगातार हड़बड़ी के लिए मिली है यहाँ सहेजो समेटो वहाँ जाओ, वहाँ भी वही करो। कुछ भी न स्थिर है न स्थाई। देश की दशा और मन की दशा एक सी है। मन भी उच नीच पहले और बाद की लड़ाई लड़ता रहता है। बस खून बहता है सफेद खून परिणाम कुछ नहीं निकलता। निकलेगा भी नहीं। इन दिनों लगातार मेरे मन में चलता रहता है कि कैसे.. कुछ नहीं।  चना काट रहा था सबकी बड़ी याद आई..पापा दीदी बच्ची सबको हरा चना भूनकर खाना पसंद है।  मुझे अजीब चिड़चिड़ाहट हो रही है। मन कर रहा है कहीं खड़े होकर चीख लूँ बस ― 18 मार्च  2025 / 7: 40 शाम 

कहीं बे-ख़्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने

बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।  मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।  ***********  सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ ...

कुछ तो लोग कहेंगे.. लोगों का काम है कहना

पिछले 3 सालों से डायरी के पन्नों पर लगभग हिसाब ने जगह ले लिया है। कहीं किराने का हिसाब है कहीं फल सब्जी और मिठाइयों का कहीं किराए लिखे हैं कहीं मजदूरों का हिसाब है। दवाओं के नाम भरे हैं या तो हॉस्पिटल के बिलों कक जिक्र है। फोन का नोटपैड भी लगभग ऐसे ही है।  मेरे आसपास के कई लोग जब मुझसे कहते हैं अरे वो तो तुम्हारे साथ ही रहता था उसका ये हो गया, तुम्हारा कैसे नहीं हुआ। मैं कुछ नहीं कहता, हँसकर कहता हूँ मैं बहैलपन करता हूँ, इधर उधर बेवजह घूमता रहता हूँ।  वो लोग घर के सदस्यों के मरने बीमार होने तक पर खड़े नहीं होते, उनके भीतर आत्मसम्मान नहीं है कहीं किसी से कुछ भी मांगकर खा लेते हैं रह लेते हैं मैं नहीं रह पाता। मुझे इज्जत का जीवन चाहिए या तो नहीं चाहिए। मेरे अकेलेपन और फेलियर होने पर सवाल उठाने वाले लोगों को पहले अपने गिरेबान में देखना चाहिए। वो जिस उम्र में खेल खा रहे थे मैं परिवार देख रहा हूँ, बहनों के लिए रिश्ता खोज रहा हूँ। वो जिसे सफलता और ऊँचाई समझते हैं उसे मैं लात मार आया हूँ, मैंने अलग राह चुनी है, मैं इसके दुखों संघर्षों को झेलने के लिए तैयार हूँ। मेरा जीवन म...

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कुछ विशेष नहीं। दौड़भाग भरा दिन। ऊब । थकन हावी है। परिवार के लगभग सब बीमारी में हैं। मैं हर तरफ भाग रहा हूँ कहीं भी नहीं पहुँच रहा।  सुकून का कोई एक कोना नहीं। किससे कहूँ मुझे छिपा लो। मैं थक गया हूँ। मैं इस जीवन से थक गया हूँ।  शायद नींद आ जाए। महादेव से एक ही विनती है या तो सब सामान्य कर दें या उठा ही लें।  ― 15 मार्च 2025 / 8:30 शाम