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आभास का अभ्यास

अकेले रहना हज़ार साँपों के बीच रहने जैसा है। सब कुछ है पर लगता है कुछ भी नहीं है। जिन चीजों के लिए उत्साह से भरा रहता था उनसब चीजों से विकर्षण और उब होती है। गुस्सा आता रहता है। सुबह उठकर घूमना शुरू कर दिया है। सही से खा पी रहा हूँ। सो भी जाता हूँ। पढ़ना भी हो रहा है। कुछ आर्थिक जरूरतों के लिए काम भी लिया है कर रहा हूँ। पर भीतर अजीब सी स्थिति रहती है। कुछ लिख नहीं पा रहा। दिन दिन भर कोई ऐसी आवाज से पाला नहीं पड़ता जिसके लिए जीवन जीना चाहता हूँ। सब मेरे लिए खड़े हैं। फिर भी न जाने क्या है जो बस है । शायद रचनात्मक बेचैनी इसे ही कहते हों। अगर मुझ जैसे कीड़े से आदमी में इतनी उथपुथल है तो जो रोज आदमियों को बना रहा, मार रहा है, दिन दिन अपना क्षरण देख कर भी सब दिए जा रहा है वह कितना बेचैन रहता होगा। ईश्वर बेचैनी का दूसरा नाम तो नहीं है ? उनकी पत्नियाँ उन्हें कैसे सही करती होंगी। उन्हें तो लगता हो न यह सब उनकी किसी कमी की वजह से है। यह सामान्य है हम जिससे प्यार करते हैं उसकी हर मानसिक स्थिति का दोषी खुद ही को मानने लगते हैं। हम बार बार पूछते हैं तुम ठीक तो हो न ? भले ही वो कुछ न बोले पर उस शांति को सुनते हैं, भीतर ही भीतर ठीक करने का जतन करते हैं। प्यार है भी तो यही, बेचैन रहना पर बेचैन होते साथी का चैन खोजते रहना। 

इन दिनों लग रहा है मुझे कोई बीमारी हो रही है, गले में अजीब सा दर्द रहता है, मुँह में छाले ही छाले हो गए हैं। 

दिन में या रात में जब उन्हीं सफेद पन्नों को देखते देखते उब जाता हूँ या दो चार बर्तनों की खटपट से मन उबता है तो फर्श पर उतान होकर लेट जाता हूँ। मुझे परिवार चाहिए होता है। मैं नहीं रह सकता यूँ ही, फोन पर कितना पूछ सकते हैं , कितनी बार कह दें उससे की याद आ रही है, कोई सुनकर भी क्या कर सकता है ? मान लो कह दे हॉं मुझे भी , उसके बाद भी तो फोन के इस पार हम अकेले बचते हैं। कहना भी तो उचित नहीं, हम किसी का ध्यान भटकाते हैं, हम उसे सोचने पर मजबूर करते हैं। जो बिल्कुल ठीक नहीं। प्रयास करता हूँ बिल्कुल हँसता खेलता दिखूं, अपने को छिपाने का मेरे पास बस एक ही तरीका है साहित्य की या परिवार की बात करना, जब इससे भी नहीं छिप पाता तो मैं रो पड़ता हूँ दरअसल मैं रोना चाहता नहीं, यह खुद होता है। मेरे पिताजी से जो बड़े हैं, यानि मेरे ताऊ जी उन्हें बीपी की दिक्कत है, उनकी बीपी इतनी रहती है कि जो भी डॉक्टर देखता है वह बस देखता रहता है, इससे उनके सर के पिछले हिस्से की त्वचा लटक सी गई है। लगता है गर्दन है ही नहीं। यह एक एक्सीडेंट के बाद और बढ़ गया, वो सोते बहुत हैं, गाड़ी चलाते, बात करते, खाते खाते, खड़े बैठे हर स्थिति में वो सो जाते हैं, डॉक्टर कहते हैं उन्हें नीद ने बचाए रखा है वरना ये कब का जा चुके होते,  आँसू और लिखना मेरे लिए वैसे ही है। 

ख़ैर ! 

आज एक लोग की मदद करने का प्रयास किया, पलट के गाली मिली मुझे, मेरे चरित्र पर उँगली उठाई गई। चरित्र तो खैर है ही लोगों द्वारा जज किये जाने के लिए, पर जब कोई माँ को गाली देता है तो मन करता है । मैं अपने क्रोध से डरता हूँ। कितने प्रयास के बाद यह सही हुआ है। अब मैं रोज अपने को रोकने का अभ्यास करता हूँ। बहुत कुछ आभास होते हुए भी चुप रहने का अभ्यास हो गया है अब। क्रोध पीने का सबसे सरल तरीका है क्रोधित को देखकर दया भावना से भर जाना। मुश्किल है थोड़ा पर अभ्यास से हो जाता है। 

 कलयुग और कितना काला होगा पता नहीं, लोग भरोसे योग्य ही नहीं रह गए हैं। मरते को राह में मरते ही छोड़ दो तो ठीक है बचाओ तो आप ही उसके मृत्यु के जिम्मेदार हो जाते हैं।

आज कुछ कुछ पढ़ाई हुई। पिछले 3 साल की ज़िंदगी देख रहा था। कई बातों से मन को सुख मिला कई से दुःख पर ठीक है जीवन यही तो है..शब्द कितने महत्वपूर्ण होते हैं न. किसी का कुछ लिखा जीने का अपने को कुछ मानने का साधन बनकर आसपास टहलता रहता है। हम जीते रहते हैं. 

― 1  अप्रैल 2025 / 11 बजे रात   

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