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वही जिसे कम सोचता हूँ ।

वो सभी लोग जिनके कई चेहरे थे, मैं उन सबको अपने एक चेहरे से देखने का आदी था। वो हर बार मुझे मूर्ख करार करते और निकल जाते। ज्यादातर उनके हर वाक्य के बाद मेरे पास विस्मयादिबोधक चिन्ह लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचता। उसके बाद मैं ख़ोजता रहता, काश कोई ऐसा वाक्य पकड़ में आता जिसके बाद मैं पूर्णविराम लगा पाता और अपने को कुछ और सोचने में प्रवृत्त कर पाउँ .. पर यह सम्भव ही नहीं हो पाता। मैं हमेशा पूर्णविराम की खोज में रहा पर मुझे हमेशा मिला विस्मयादिबोधक चिन्ह !

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क्या मैं हर जगह बस फेल होने के लिए बना हूँ ? दिलासे के अतिरिक्त कोई लॉजिकल जवाब है जिसके बाद मैं बस स्थिर हो उस जवाब को क्रियान्वित करने की तरफ बढ़ता और कुछ समय बाद जवाब देने वाले को कह पाता.. 'शुक्रिया आपके जवाब ने मुझे ढ़ेरों सवालों से बचा लिया'

दरअसल है ही ऐसा एक सही उत्तर हज़ारों प्रश्नों से हमें बचा लेता है। जैसे अभी मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ वह ठीक ठीक नहीं मिल रहा है। जिस भी क्षण मिल जाएगा कलम ठहर जाएगी। 

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हर दो लोग के बीच एक तीसरा आदमी है। जो पहले आदमी की असुरक्षा का कारण है। पहले आदमी की सोच में सबसे ज्यादा उथलपुथल उस तीसरे आदमी की वजह से है फिर भी वह दूसरा आदमी उस तीसरे आदमी को दूर नहीं करता न ही स्पष्ट करता है कि वह दूसरे आदमी के साथ है। वह दोनों तरफ भले बने रहने की कोशिश में दोनों तरफ अधूरा और असुरक्षा बनकर रहता है। इसमें दोष न तीसरे का है न पहले का, दोष बस दूसरे का है। उसे यह स्पष्ट रखना चाहिए कि उसके लिए पहला काफ़ी है। मगर यह सब सबसे पहले उसे अपने मन में करना होगा। नहीं तो वह दो दो मन एक साथ दुखाता रहेगा। 

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मैं क्या कहना चाह रहा हूँ मैं खुद नहीं जानता। जो कुछ कहना चाह रहा हूँ उसके लिए शब्द पकड़ में नहीं आ रहे हैं लग रहा है जैसे सब फिसल रहा है। जीवन भी, मन भी। 

मन लगातार एक खालीपन से भरा रहता है। जिसे रोकना चाहता हूँ रुकता नहीं। जिसके लिए रुकना चाहता हूँ किसी न किसी न किसी दिन वो संदेह की नज़र से देख लेता और मन टूट जाता है। इन दिनों कुछ नहीं पढ़ रहा हूँ, बस सोता रहता हूँ, या बीते सब सोचता रहता हूँ। कितनी सही उम्र में कितनी गलत इच्छाओं के पीछे दौड़ा मैं। अब समझ आ रहा है। बीते को काश ठीक किया जा सकता। माता पिता का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है। मैं कहाँ से ले आऊँ इतने पैसे की सब सहज चल पाए। मन किसी से बात करने का नहीं करता । हर आवाज़ चुभती और मजाक उड़ाती हुई लगती है। 

ख़ैर ! 

कुछ जो आप निरंतर कर रहे हों उसे छोड़ दीजिए तो फिर वह वैसे नहीं हो पाता जैसे होता रहा है। छुटी और टूटी चीजों की तरफ लौटना अपने को बस कष्ट देना ही है। यहाँ कृष्ण का जीवन ध्यान देना चाहिए। जहाँ रहो बस वहीं के रहो। 

पर हम सामान्य आदमी कहाँ रह पाते हैं। माजी का ख्याल हमें रुलाता है.. भविष्य की चिंता हमें सोने नहीं देती। आखिर जाएँ कहाँ.... 


― 19 अप्रैल 2025 / 7 बजे शाम 

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