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स्मृति का अपना एक अलग देश है

शाम देर तक एक गली के मुहाने पर बैठा रहा। यही जगह है जहाँ मैं बिना ऊबे घण्टों बैठ सकता हूँ। यहाँ की सड़क किनारे मैंने अलसुबह दुकान लगने से पहले और रात दुकानों और लोगों के सो जाने तक प्रतीक्षा किया है। यहाँ जब जब आता हूँ मैं भूल जाता हूँ कि मेरी स्मृति से परे भी एक दुनिया है। जीवन के सुंदर होने की जो एक कल्पना जीने का कारण बनी हुई है, उसकी एक बारीक़ सी किरण यहीं चारों तरफ़ खड़े ऊँचे मकानों से छनकर आती है। यहीं वह कमरा है जिसकी हर दीवार से मुझे प्रेम है। ईश्वर ने सामर्थ्य दिया तो मैं जिंदगी भर के लिए उस कमरे को किराए पर ले लूँगा, और जब जब जीवन से जीवन कम होने लगेगा जाऊँगा वहाँ उसकी दीवार से पीठ टिकाकर बैठा रहूँगा, उसकी फर्श पर निर्वस्त्र हो लेट जाऊँगा और उस कोमल पांव को अपनी देह पर महसूस करूँगा जो यहाँ चला करते थे। उन आवाजों की प्रतिध्वनि सुनूँगा जो कभी मुझसे कहे नहीं गए।   शहरीकरण में स्मृति से जुड़ी चीजें टूटती बनती रहती है, स्मृति तो कभी टूटती ही नहीं, वह एक बार जिस रूप रंग जिस साँचे में गढ़ दी जाती है फिर वैसी ही बनी रहती है, स्मृति वह इतिहास नहीं जो किसी के संवेदना से ...