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खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

बे-रंग का रंग

एक अनकही टीस । कोई टूटन। होने और न होने का भरम। कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा और कहीं न हो पाने का दुःख। मन एक कन्धा ख़ोजता रहा। देह एक कोना। दोनों नसीब नहीं। सारे वातावरण में रंग उड़ रहे हैं, हमारे यहाँ रंग उड़ गया है। अब आगामी हर होली इस एक वाक्य से इस एक कमी से इस एक नमी से सामना होगा जो हर बार इसी रूप में होगा कि अभी वो होती तो कितना अच्छा होता। परिवार पूरा साथ आखिरी बार 2014 में दीदी की ही ( जो अब नहीं हैं)  शादी के समय होली में था। वह होली सच में रंग वाली होली थी। परिवार के साथ और प्यार के रंग वाली। और त्यौहार तो लगभग आधे अधूरे ही बीतते हैं। बीतेंगे आगे भी भविष्य में। हमारी चाहना ने हमारे जीवन से जीवन खींच कर निकाल दिया।  ऐसा क्यूँ है कि सुख और शांति साथ नहीं मिलती। समृद्धि आती है तो शान्ति गायब हो जाती है। शांति आती है तो समृद्धि गायब। माया का जाल कितने फर्द का बना है आदमी एक बार उलझता है तो खुलता ही नहीं।  ख़ैर ..! सैकड़ों रंगपर्व की शुभकामनाओं पर कुछ नहीं बोल सका।  सुबह से दाह के बाद की क्रियाओं में व्यस्त था। कल से अब तक जो किया जो सुना जो देखा मुझे यही सम...

भावनाएं गूँगी नहीं होतीं !

समझने समझाने और तमाम ज्ञान भरी दुनियावी औपचारिक बातों से परे जो मूलभूत बात है वह है साथ, मुझसे नहीं झेला जाता अकेले यह जीवन.. कितनी देर बिना अपने सबसे प्रिय की आवाज़ रहा जा सकता है, कुछ मिनट कुछ घण्टों बस.. यह हद है। अपनी पीड़ा अपनी पीड़ा लगती ही नहीं जब वो परेशान हो.. अपना दुःख न्यून हो जाता है। सब दे देने, सब सौंप देने की इच्छा होती है। कितना भी समर्पित कर दें खुद को,लगते रहता है कि थोड़ा और..ऐसा क्या करें कि उस में समा जाएं। आह ! प्रेम... फिर भीतर सवाल भी उपजता है कि मेरा है क्या ? मैं भी तो अपना नहीं हूं उसका हूँ.. खुद को तो कब का उसके हवाले कर चुका हूँ। फिर किस अधिकार से अपने को देने का दावा कर रहा हूँ। अपने को तो मैं दे चुका हूं तुमको, तुम क्यूँ नहीं रखती मुझे अपने पास.. क्या तुम्हारे पास रहने के लिए तुम्हारे कोख से जन्म लेना ही अनिवार्य शर्त है। अगर हो सके तो मुझे अभी भर लो अपने मन के गर्भ में और दे दो जन्म जिससे तुमसे रहा न जाए मुझसे दूर..  यह साल भी यूँ ही बीतेगा क्या ? तमाम इच्छाओं पर अंकुश सहते, मन के शब्दों पर नहीं की छपकी पड़ते।  अपनो से दूर रहकर अपने को स्थिर कैसे रख...

शाम ढले डरने लगता है दिल कोई छोटा बच्चा है

मन लगातार बस एक तरह का रहता है। भीतर यह चाह बनी रहती है कि कैसे करके वहाँ पहुँच जाऊँ जहाँ आसपास सब कुछ अपना सा है। संयुक्त परिवार भी रहा तो बहुत शालीनता और ज्यादा खामोशी कम वाचालता के साथ रहा। हम बचपन से जैसे जैसे बड़े हुए लोग अपनी रोजी रोटी के लिए जहाँ गए वहीं बसते गए। बाबा की मृत्यु हुई, परिवार पूर्णतया बिखरता गया। यही मौसम था यही समय मैं भूल नहीं रहा हूँ तो यही तारीख़ भी, हमको वो दिन एक एक पल याद है। हम सब जब श्मशान से लौटे तो ननिहाल से खाना आया था, हम सब भाई बहनों ने वही खाया था। पिताजी लोग तो वैसे ही रहे थे। अगले दिन क्रिया शुरू होने के पश्चात शाम को कुछ खाया था शायद आलू या गंजी उबाली गयी थी। सन 2009 की बात है, मकर संक्रांति पड़ी थी अगले दिन.. महीने दो महीने लोगों का आवागमन रहा फिर घर पर कुल 5 लोग बचे, मैं दोनों बहनें माँ और दादी... हम सब में कोई बहुत बोलने वाला नहीं है। सब अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त, बात होती भी तो लो टोन में वो आवाज़ कान को दुःख देने वाली नहीं होती थी। परिवार में बचपन से बहुत संस्कारित माहौल था। 5 बजे सुबह उठना, सबके पैर छुना, वंदना करना, खेत जाकर काम करना, फिर स...

स्वसंवाद

सुंदर सपने को एक बार और देख लेने की चाहत बड़ी अजीब होती है। हम उस मोह में टूटी नींद के बाद फिर नींद लाने का लाख जतन करते हैं पर आती नहीं। आ भी जाती है तो वह सपना नहीं आता जिसके लिए नींद को मनाया जा रहा होता है। एक बार उठा, फिर लेट गया। सुबह देर तक बिस्तर में पड़ा रहा, मगर... टूटे हुए सपने और भविष्य के नाम टाल दी गयी योजनाएं बड़े किस्मत वालों की ही पूरी होतीं हैं। हर दिन की अपनी मजबूरी होती है, और हर नए दिन की अलग आवश्यकता, अलग इच्छा है। प्रयास करो चीजें टालो नहीं, जब जो मन करे जी लो..'अगले पल' जैसे शब्द के चक्कर में मत जिओ।  *********** मन कुछ अनमना सा था थोड़ी देर प्रश्नों से जूझता रहा फिर लगा खोपड़ी आँख से टपक जाएगी तो सब समेट कर लेट गया। थोड़ी देर लेटने के बाद बाबा की एक बात याद आयी और उठ बैठा, वो जो बात याद आई वो बात वही थी जो सबके बाबा या पिताजी सबको कहते हैं। अरे भई वही 'दिन में सोना बीमारी का घर' , उठा तो इधर उधर कुछ घड़ी चलता रहा, फिर मन में आया, बिखरी चीजों को सही कर देते हैं। शुरू हुआ तो पहले पहल हर कोने से, बिस्तर के नीचे से सिक्के निकले उन्हें गुल्लक में भरा, पापा ...