चुप होने से पहले हम बहुत बोल रहे होते हैं। हम अचानक से चुप नहीं होते हैं, एक प्रक्रिया के तहत धीरे धीरे किस्तों में चुप होते हैं। कभी अनसुना किए जाने से, कभी अपने बोले को बेअसर होते देखने से और कभी कभी अपने बौद्धिक दबाव से.. यह सब बहुत मध्यम गति से होता है, जब तक हमें आभास होता है तब तक वह हमारी पहचान बन चुका होता है। हम गढ़े जाते हैं किसी और के मन और बुद्धि के साँचे अनुरूप, हमें चुनने की आज़ादी नहीं होती, हमारे लिए जो चुना जाता है उसे ही हमारी आज़ादी कहकर हमें पकड़ा दिया जाता है। हम किसी को मन भर गले नहीं लगा सकते, उसे चूम नहीं सकते क्योंकि हमें वह सुचिता से जोड़कर बताया गया, जबकि हम बने ही दो देहों के मिलन से हैं। हमें बहुत सामान्य सामान्य सी बातों को भी इतना आदर्शीकरण करके बताया जाता है कि जब हमें ऐसा कुछ जीने को मिलता है तो हम अपने दिल और दिमाग के द्वंद्व से ही थक जाते हैं और उसे धकिया देते हैं जिसे समेट लेना चाहिए था। दर'असल यह परवरिश की खामी है। हमें जिन्हें खोलकर रखना चाहिए हम उसे ढंककर रखते हैं जो खुला रखना था वह ढंककर। कह देने पर यह बात स्वीकार नहीं की जाती है। जैसे मैं नहीं स्...