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घनी थी उलझन, बैरी अपना मन


कामनाओं की अति आदमी को आलसी कर देता है, वह एक ख़्याली दुनिया में रहने लगता है। वहाँ रहना घातक है। यूँ ही रचनात्मकता आदमी को मानसिक रूप से जितना चलायमान बनाता है, शारीरिक रूप से उससे कहीं अधिक आलसी बना देती है। मुझे जब जब घेरती हैं कामनाएं लिखता हूँ फाड़ देता हूँ। मैं इससे अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता अपने मन के प्रति। इच्छाओं को लिखकर फाड़ देना, खुद को थोड़ा थोड़ा फाड़ना है। यह भावनाएं नहीं है.. इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ होंगी तो हम चाहेंगे उन्हें कोई या जिससे वह इच्छा है वह उसे पूरा करे। हम किसी पर हावी होंगे। या खुद बेचैन रहेंगे और जब खुद बेचैन रहेंगे तो खुद से जुड़े लोगों को सुकून कैसे देंगे भला। बेहतर है कम से कम इच्छाओं का प्रकटीकरण हो। उन्हें भीतर ही भीतर काटते छांटते रहिए। भावनाएं अति वैयक्तिक होती हैं। और बहुत निजी। यह जिसके लिए होतीं हैं उससे साफ सपाट कह देना चाहिए। यह बोझ नहीं बनता, न बनाता है। हाँ भावनाओं को कहना भर हो उसे थोपना नहीं। ज्यादातर तो हम उन्हें वैसे का वैसे बता या जता नहीं पाते जैसे वह होती हैं। भावुक आदमी के बोलने के दो ही साधन हैं या तो आँसू या चुप्पी। मेरे पास दोनों रहते हैं। मैं उन कामनाओं को जिनको लिखकर फाड़ नहीं पाता, उन भावनाओं को जिन्हें कहकर जता नहीं पाता उन्हें आँसू के जल से ही धोकर साफ कर देता हूँ। यही किया। 


रात एक रिकॉर्डिंग सुन रहा था और मैं भूल गया था यह रात है और मैं सोने के लिए बिस्तर पर लेटा हूँ। सुबह तनिक देर से उठा था। उठकर वही किया जो रोज करता हूँ। हाथ पकड़े, तस्वीरे देखी। फिर पाँव जमीन पर रखा। महादेव से सब सही करने की प्रार्थना की, मैं उनसे अपने लिए बस इतना मांगता हूं कि वो मेरे घर को खुशहाल रखें, उसकी इच्छाएँ पूरी करते रहें, बीमारी और चिंता मुझे देते रहें, मैं सब झेल सकता हूँ। कल दीवारों से कुछ फ्रेम और पोस्टर हटाए थे उन जगहों को देख रहा था, वो और दीवारों से अलग रंग की हो गईं हैं, दीवार ने फ्रेम को जहाँ जगह दी, फ्रेम ने उतनी दूरी में उनका वास्तविक रंग बचाए रखा। हम आदमी ऐसा क्यूँ नहीं कर पाते ? फ्रेम फिर वहीं लगाना है। पर मन नहीं किया। कुछ किताबें खोजी, डिक्शनरी की धूल झाड़ी, थोड़ा अनुवाद किया, कुल 4 पेज। एक नई थीसिस का काम मिला है। पैसे वगैरह मिलने मुश्किल हैं पर जिनका है वो परिवारिक महिला हैं , जिम्मेदारी और बीमारी से परेशान, पैसे भी नहीं हैं। तो .. ख़ैर ! 

कल से मन को अजीब सी आशंका घेरे हुए है। न जाने क्यूँ लग रहा है जैसे कहीं कुछ छिपाया जा रहा। कुछ तो दिक्कत है। अजीब सी घबराहट होती है। मैं अपने भीतर की इस घबराहट को पहचानता हूँ। यह झूठी नहीं होती। इसीलिए डर और लगता है। 

शाम पुरानी पढ़ी किताबों को देख रहा था, उनके अंडरलाइन देख रहा था, हम कई बार एक अंडरलाइन से उस लाइन तक पहुँच जाते हैं जिसके इस पार होने के लिए हमें बहुत जहमत उठानी पड़ी थी। सच ही कहा है किसी ने किसी का मनोविज्ञान समझना हो तो उसकी पढ़ी किताब का अंडरलाइन पढ़ो। ऐसी कितनी बातें हैं जो होती हैं हो रहीं होती हैं हम उन्हें कहना नहीं चाहते हैं, शायद कहकर हम जितना हल्के हों कोई उससे कई गुना भारी हो जाए। यह जो अब सीखा है इससे पहले मैने लिखकर फाड़ना सीखा था। 

चाय बनाकर बैठा था तो सलिल चौधरी के कम्पोज किए गाने सुन रहा था। कितनी साफ सी म्यूजिक देते हैं न कुछ लोग, लगता है सच सच वही समझते हैं कि गाने के बोल को उभरने देने की जरूरत है। उन्होंने राजेश खन्ना की कई फिल्मों को संगीत दिया है। उन्हीं का कम्पोज एक गाना है जिसमें वो लेखक के शब्द को अपनी संगीत चाशनी में भिगोकर यूँ सुनाते हैं जैसे लगता है वो अपनी ज़िंदगी इसी वाक्य में कह देना चाहते हैं.. कहते हैं – 'घनी थी उलझन, बैरी अपना मन / अपना ही होके सहे दर्द पराये'

अच्छा संगीत वही है जो गीत को खोल दे, अच्छा साथ वो है जो अपने साथी को हल्का कर दे, अच्छा जीवन वह है जो अपनों के लिए जी जाए। 

शायद मैं गलत होऊं... सही तो हर जगह ईश्वर भी नहीं है। 

पिताजी आज झटपट में घर से निकले, धूप उनसे बर्दाश्त नहीं होती, सिर की चोट परेशान करती है, मगर ये सरकारी भ्रष्ट अफसर.. क्या ही कहूँ। 

रात मम्मी से बात हूँ, शिकायत कर रहीं थीं कि पापा से बात कर लिए हमसे नहीं किए। ऐसे अधिकार से ही जीवन बनता है, परिवार ऐसी ही जिद से सुंदर होता है, कभी कभी वो ख़ूब हँसती हैं बोलते बोलते हँसती हैं, मैं प्रयास करता हूँ मैं जितनी देर उनसे बात करूं वो अपने अतीत के छाले न छूने पाएं।

हँसती हुए स्त्री कितनी सुंदर लगती है.. 

― 31 मार्च 2025 / 7: 30 शाम 

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