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ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा। 

सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है। 

मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है। 

अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का दिन मैं पिछले कई दिनों से गिन रहा था.. गिनता ही रह गया। इसमें किसी का कोई दोष नहीं, हर व्यक्ति की अपनी परेशानी है वो उसमें उलझा हुआ है। इस विषय में किसी से कुछ कहा भी नहीं जा सकता है क्योंकि हर व्यक्ति को लगता है यह सब क्यूँ, अपने आप में मस्त क्यूँ नहीं रहते, अब उन्हें कौन समझाइए की अपने आप मे ही मस्त होना होता तो इंसान और इंसान क्यूँ पैदा करता.. रह लेता इस अचल धरा पर अकेले मस्त बिल्कुल

रात देर तक जाने क्या क्या सोचता रहा था, कोई कोई पंक्ति अटकती रही, लगा इसे उठकर लिख दूँ, फिर मन ही नहीं हुआ। चौरसिया जी की बाँसुरी राग मालकौंस में गा रही थी और मैं मन के धागे से स्वेटर बुनते पड़ा था। जितने संवाद जितने सवाल जितने पल सोचे थे सब भीतर ही रह गए, कुछ बोल पाने का मौका ही नहीं मिला। 

ऐसा बहुत कम होता है कि मुझे अपना लिखा कुछ याद आए पर आज दिन भर अपनी ही लिखी एक कविता अनुक्रम याद आती रही। याद आती है तो याद करना ही पड़ता है और कुछ नहीं कर सकते हैं आप 

―  2 जनवरी 2026 

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