मन किसी खंदक की खोह में घूमता रहा था सुबह से। रात की थकन पर अकेले पड़े रहने और अपने होने की व्यर्थता बोध ने परेशान रखा। एक याद सालती रही भीतर। दोपहर होते होते दिन खुला। मन ऐंठता रहा। यूनिवर्सिटी के गेट तक गया। लौट आया। मन कर रहा था बस कहीं पड़ा रहूँ। बाहर लईया चना खाता बैठा रहा। फिर कुछ दिन हुआ.. रौशनी लौटी। अब मेरी आँखों मे रौशनी है। ज़िंदा की तरह महसूस रहा हूँ। सब ठीक है। गीत चतुर्वेदी का 'लैम्प पोस्ट' पढ़ना शुरू किया है। 2 लेख पढ़ें हैं। अभी जीवन पढ़ रहा हूँ। पिताजी ऑफिस से थके हारे आएं थे। उन्हें माँ के स्वास्थ्य की चिंता है। मुझे दोनों की..
फिर आगे..
― 3 मार्च 2025 / 9 : 15 शाम
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