ज़िन्दगी की चादर कई सूत से मिलकर बुनी होती है। उस कई से कोई एक भी खींच लिया जाए तो सारे सूत ढीले हो जाते हैं। ईश्वर ने आज एक और सूत खींच लिया। कलाई से एक राखी छीन ली ईश्वर ने। अब वह आवाज़ कभी नहीं सुनने को मिलेगी जो देखते ही कहती थी '..अरे दुर्गेश.. और लग जाती थीं सीने से जैसे छोटी बच्ची, जबकि थीं मुझसे 12 वर्ष बड़ी। बड़की दीदी सुन कितना ख़ुश होती थीं।
वो गिनती गड़बड़ हो गयी जिसके लिए बचपने में घमंड का भाव था मस्तिष्क में। कोई पूछता कितने भाई बहन हो तो कहता, 7 भाई 5 बहन । भाई 7 से 6 हो गए थे जब आदित्य गए थे और आज बहनें 4 रह गईं। भीतर से जैसे अपराधबोध से भरा हूँ जबसे पता चला है कि बीते दिनों बेड पर पड़े पड़े हर आते को मेरे नाम से पुकार ले रहीं हैं। 'दुर्गेश हैं , दुर्गेश कहाँ हैं..' मैं कहाँ हूँ ? मैं मर गया था दीदी। तुम्हारे लिए यहाँ जगह बन रहा था। तुम अब इस दैहिक कष्ट से मुक्त हुई। जबसे होश संभाला है मैंने कभी तुम्हें पूर्ण स्वस्थ नहीं देखा। एक मन कहता है तुम्हारे लिए बहुत अच्छा हूँ एक मन कहता है। मोह चाहती है हम कसे रहें। प्रेम कहता है उसे आज़ाद कर दो । पता नहीं क्या ठीक है।
शिकायत में ही प्रेम है। अपनत्व की भावना है। जुड़े रहने और विशेष बने रहने की गहन इच्छा से ही तो पनपती है शिकायत..
बदरंग का भी एक रंग है।
ग़ैर जरूरी भी है जरूरी।
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हाथ पाँव अजीब से कांप रहें हैं। भीतर से जितने आँसू बहे हैं लग रहा है शब्द सूख गए हैं।
दिन भर उसी देह के आसपास रहा। लगभग डोम का काम किया। चिता सजाई। आग दी। बांस से अधजली देह समेटा। पूरी देह के राख होने तक खड़ा रहा है। जिसको कभी कठोर आवाज़ में नहीं बोला उसपर बांस चलाया। मन काँप रहा।कैसे कर गया सब। मुझे क्यूँ आता है यह सब।
ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दें बड़की दीदी। आपकी राखी आपकी अनुपस्थिति में भी बँधेगी मेरी कलाई पर बस फ़ोटो भेजकर कह नहीं पाउँगा कि दीदी बाँध लिया है. न तू कहबू कि हमरी तरफ से दुइ लड्डू अउर खाय लिहा ..
― 13 मार्च 2025 / 10 : 10 रात
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