सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कच्चा धागा

ज़िन्दगी की चादर कई सूत से मिलकर बुनी होती है। उस कई से कोई एक भी खींच लिया जाए तो सारे सूत ढीले हो जाते हैं। ईश्वर ने आज एक और सूत खींच लिया।  कलाई से एक राखी छीन ली ईश्वर ने। अब वह आवाज़ कभी नहीं सुनने को मिलेगी जो देखते ही कहती थी '..अरे दुर्गेश.. और लग जाती थीं सीने से जैसे छोटी बच्ची, जबकि थीं मुझसे 12 वर्ष बड़ी। बड़की दीदी सुन कितना ख़ुश होती थीं। 

वो गिनती गड़बड़ हो गयी जिसके लिए बचपने में घमंड का भाव था मस्तिष्क में। कोई पूछता कितने भाई बहन हो तो कहता, 7 भाई 5 बहन । भाई 7 से 6 हो गए थे जब आदित्य गए थे और आज बहनें 4 रह गईं। भीतर से जैसे अपराधबोध से भरा हूँ जबसे पता चला है कि बीते दिनों बेड पर पड़े पड़े हर आते को मेरे नाम से पुकार ले रहीं हैं। 'दुर्गेश हैं , दुर्गेश कहाँ हैं..' मैं कहाँ हूँ ? मैं मर गया था दीदी। तुम्हारे लिए यहाँ जगह बन रहा था। तुम अब इस दैहिक कष्ट से मुक्त हुई। जबसे होश संभाला है मैंने कभी तुम्हें पूर्ण स्वस्थ नहीं देखा। एक मन कहता है तुम्हारे लिए बहुत अच्छा हूँ एक मन कहता है। मोह चाहती है हम कसे रहें। प्रेम कहता है उसे आज़ाद कर दो । पता नहीं क्या ठीक है।

शिकायत में ही प्रेम है। अपनत्व की भावना है। जुड़े रहने और विशेष बने रहने की गहन इच्छा से ही तो पनपती है शिकायत.. 

बदरंग का भी एक रंग है। 

ग़ैर जरूरी भी है जरूरी।

********
हाथ पाँव अजीब से कांप रहें हैं। भीतर से जितने आँसू बहे हैं लग रहा है शब्द सूख गए हैं। 

दिन भर उसी देह के आसपास रहा। लगभग डोम का काम किया। चिता सजाई। आग दी। बांस से अधजली देह समेटा। पूरी देह के राख होने तक खड़ा रहा है। जिसको कभी कठोर आवाज़ में नहीं बोला उसपर बांस चलाया। मन काँप रहा।कैसे कर गया सब। मुझे क्यूँ आता है यह सब।

ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दें बड़की दीदी। आपकी राखी आपकी अनुपस्थिति में भी बँधेगी मेरी कलाई पर बस फ़ोटो भेजकर कह नहीं पाउँगा कि दीदी बाँध लिया है. न तू कहबू कि हमरी तरफ से दुइ लड्डू अउर खाय लिहा ..

― 13 मार्च 2025 / 10 : 10 रात 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होने और न होने के बीच की याद

बहुत कुछ पूरा होता है तब भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। कई बरस पहले ही किसी कविता में कहा था 'नमी जब ज्यादा हो तो बीज उगते नहीं हैं सड़ जाते हैं' उसे फिर फिर महसूसने का दिन रहा। पिछले 24 घण्टों में कई बार डायरी खोले बैठा। बैठा ही रहा। एक शब्द नहीं लिख पाया। आत्माख्यान, आत्मलीन और आत्मरत होकर नहीं लिखा जा सकता। अपने से अलग होना पड़ता है। नहीं लिख पाया। एक शब्द भी नहीं। एक ख़ालिस डॉट या पूर्णविराम भी नहीं। कागज कोरा का कोरा रहा। हाँ, दो चार बूंद आँसू जरूर गिरे। फिर उस पर कुछ लिखा नहीं। तारीख़ डाल दिया अभी। और पन्ना बदल दिया। कोई कभी पढ़ पाया तो वही जान पाएगा वह जो उसपर सम्भावित था लिखा जाना। शायद नहीं जान पाएगा। नहीं जान पाएगा तो मेरा ही फायदा है। यूँ भी तो मेरा मन सबका मन रखने के लिए बना है। मेरा मन कहीं कोने में रख दिया गया था बरसों पहले। कौन जतन करेगा उसे उठाकर झाड़ पोंछ कर देखने की। मैं खुद भी नहीं करता।  अपने हाथ से बिछाए फूल अपने ही हाथ से समेटे। समेटते हुए वह मखमली नहीं लग रहे थे। कँटीले भी नहीं थे। सब वैसे का वैसे रख दिया। बिल्कुल यंत्रवत रहा। कपड़े निकाले सिरहाने रखी कुर्सी पर र...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...