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विपर्यय

कोई है, यह भावना कितनी सुंदर होती है न ! भले ही वो आपके क़रीब न हो, मगर आस पास है यह महसूस कर पाना भी कितना सुख देता है। हम अपने मन के लोगों के होने भर से कितने हल्के हो जाते हैं, लगता है देह में कोई भार ही नहीं है, पढ़ा लिखा याद रहता है, भूख लगती है, नींद आती है, अपनी देह सुंदर लगती है, उदासी, उदासी भी कोई चीज़ होती है क्या ? अकेलापन तो लगता ही नहीं, ख़ुद से ही बतियाते रहते हैं। ख़ुद से ही ख़ुद को कहते हैं जब लगेगा अकेले हैं बुला लेंगे कितनी तो ट्रेनें हैं कितने साधन , आ जाएगा वो घण्टे भर में.. 

महीने बाद कल रात नींद आई.. नींद आने की तरह नींद आई। ऐसी गहरी नींद पहले कोई किताब पढ़कर रखने पर आती थी। मुझे अपना सोना याद रहता है कि मैं कब कब सोया हूँ। एक महक हावी रही। मैं ज़िंदा रहा.. | 

दूरियां हमसे कितना कुछ छीन लेतीं हैं। अब लगता है सच में कृष्ण विरह में गोपियों का वही हाल हुआ रहा होगा जैसा सूरदास अपनी बन्द आंखों से देखते रहे थे और लक्ष्मण से दूर रहने पर उर्मिला का जैसे साकेत में गुप्त जी लिखते हैं या शायद उससे भी बुरा.. क्योंकि भावनाओं का ठीक ठीक शाब्दिक रूपांतरण नहीं हो सकता है, न उस पीड़ा का ठीक ठीक आकलन जो अपने जीवन से दूर रहने पर होता है। 


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औपचारिक होकर रहना हर किसी के वश में नहीं होता। मेरे तो नहीं है। नहीं हो पाएगा। मैं होना नहीं चाहता। मुझे बस कुल 12 लोग चाहिए। वो न मिलें तो ख़ुद को भी नहीं चाहता। 

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थोड़ी बहुत पढ़ाई हुई, संतुष्ट नहीं हूं। मगर ठीक है। संतुष्ट नहीं होना चाहिए संतुष्ट व्यक्ति मृत समान है। हर जगह संतुष्ट रहना ठीक नहीं है, खासकर ज्ञान, दान, प्रेम और सेवा में व्यक्ति को असंतुष्ट ही रहना चाहिए। 

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आज दिनभर मैं बार बार एक बात सोचता रहा कि उस दिन क्यूँ मैंने अपना नाम आशुतोष रखा था। नाम अनुरूप सारे गुण मुझमें आ गए हैं। कुछ और रख लेता तो शायद सहन शक्ति और धैर्य आ जाता जो नहीं है मुझमें.. कैसा होगा ये ? खैर मुझे चाहिए भी नहीं। मुझे जीवन मन मार कर नहीं जीना, मन खोलकर, परिवार के साथ ही जीना है। नौकरी मुझसे नहीं होगी। मैं स्वतंत्र काम ही कर सकता हूँ। मुझे आदेश बजाना नहीं आता, झुकना तो बिल्कुल नहीं होता। मैं चाहता भी नहीं कि कभी कोई मेरे लिए भी झुके। हर व्यक्ति की रीढ़ सीधी रहे। 

मैं आदेश उसी एक का मानता हूँ बस... वह मुझे कभी नहीं कहता आप ये करो। 

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एक कविता आधी लिखी, शाम तक पूरी हुई। फिर काट दिया। वह कविता नहीं थी। फिर क्या थी पता नहीं। मगर उतरी हृदय से ही। मैं सोच विचार कर लिख ही नहीं पाता न त्वरित लिख पाता हूँ। वरना इतनी दुर्घटना हुई, इतने प्रिय लोग चले गए, उन्हें शब्द तो अर्पित कर देता। उस्ताद राशिद खान, पंडित हरिराम, पंकज उधास, उस्ताद जाकिर हुसैन, शारदा सिन्हा, यामिनी कृष्ण मूर्ति, मालती जोशी, यह सब तो मन का एक कोना खाली कर चले गए, इनकी कलाओं का कितना उपकार है मेरे मन पर.. उसे चुकाया ही नहीं जा सकता। मुझे चुकाना भी नहीं है। 

रतन टाटा और मनमोहन सिंह जी का जाना तो बचपन के किसी पसंदीदा खिलौने के छिन जाने जैसे था। मगर... 

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जीवन अपूर्ण इच्छाओं पर जबरन चिपकाई पूर्ण इच्छाओं का कोलाज है। 

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छाया मत छूना मन सुनते हुए सोया था। सुबह से भारती जी की कविता है 'तुम्हारे पाँव मेरी गोंद में ' गुनगुना रहा हूँ। 


हो गए बेहोश दो नाज़ुक मृदुल तूफ़ान

मेरी गोद में!

ज्यों प्रणय की लोरियों की बाँह में

झिलमिला कर,

औ जला कर तन, शमाएँ दो

अब शलभ की गोद में आराम से सोई हुई,

या फ़रिश्तों के परों की छाँह में

दुबकी हुई, सहमी हुई

हों पूर्णिमाएँ दो

देवता के अश्रु से धोई हुईं

चुंबनों की पाँखुरी के दो जवान गुलाब

मेरी गोद में!

सात रंगों की महावर से रचे महताब

मेरी गोद में!

ये बड़े सुकुमार,

इनसे प्यार क्या?

ये महज़ आराधना के वास्ते

जिस तरह भटकी सुबह को रास्ते

हरदम बताए शुक्र के नभ फूल ने

ये चरण मुझको न दें

अपनी दिशाएँ भूलने।

ये खँडहरों में सिसकते, स्वर्ग के दो गान

मेरी गोद में!

रश्मि-पंखों पर अभी उतरे हुए वरदान

मेरी गोद में!


इसे यूँ ही पढ़ते हुए सुन लीजिए, ध्वनि को लिखा नहीं जा सकता। लिखा जा सकता तो मैं प्रयास करता। 

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इतना ही याद है। मेरी याददाश्त बड़ी कमजोर है। कई बार इस बात पर ताना मिलता है, कल मैं गाजर का नाम भूल गया था। मुझे भूलता नहीं है कुछ, बस वह स्मृति में कहीं दब जाता है। यह तब ज्यादा होता है जब मैं वर्तमान को जो रहा होता हूँ। 

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― आशुतोष प्रसिद्ध 

28 दिसम्बर 2024 / 7: 45 शाम 

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