जाने क्यूँ कल से लगातार मैं दो चीजें कर रहा हूँ, एक तो एक गाने को लगातार गाए जा रहा हूँ वो भी ऐसे गाने को जिसको सुना नहीं है शायद सालों से, जो मुझे पसंद भी नहीं है। यह अजीब लग सकता है कि पसंद नहीं है तो याद कैसे है और गा कैसे रहा हूँ, लेकिन यही सच है।
दूसरा यह कि मुझे बार बार जाने क्यूँ जड़त्व का नियम याद आ रहा है। पिछले दो साल से मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं स्मृति में घूमता रहता हूँ, भौतिकी पढ़े मुझे 8 साल हो गए होंगे या ज्यादा पर अब मुझे उसके एक सिद्धांत सूत्र और परिभाषा याद आते हैं। इसका क्या अर्थ है पता नहीं !
जड़त्व का नियम याद करते रहना चाहिए। जीवन का नियम भी यही है।
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मैं समझ नहीं पाता हूँ समय तेजी से गुजर रहा है या घटनाएं तेजी से घट रहीं हैं। मन लगातार भावनात्मक उठापटक का मैदान बना रहता है, एक पल को मन खुश होता है, एक पल को सशंकित, एक पल को चिड़चिड़ा, एक पल को रोमांटिक, एक पल को भयभीत, एक पल को अकेला, एक पल को बिल्कुल बुद्धू, एक पल को विशुद्ध वैचारिक, एक पल को आशंका से भरा हुआ, एक पल को बच्चा, एक पल को बड़ा, एक पल को भाई, एक पल को प्रेमी, एक पल को बेटा, एक पल को कोई नहीं, सब विलीन हो जाता है। जीवन बिल्कुल अकेला निरभ्र, जैसे हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। इतने सारे पल हैं कि पलों का कोई ठीक क्रम ही नहीं बन पा रहा है। जी लेने की इच्छा से भरा हुआ व्यक्ति सबसे ज्यादा मौत के विषय में बात करता है, अगर कोई बार बार मरने की, मृत्यु की बात करता हो तो समझिए वो जी लेने की इच्छा से भरा हुआ है, वो डरा हुआ है कि उसके मन में जितना जीवन का सपना है समय उतना मिलेगा की नहीं.. डर में आदमी सबसे ज्यादा उल्टा पुल्टा बोलता है।
सुंदर सुबह धीरे धीरे कठोर दोपहर की तरफ गई और कठोर दोपहर फिर लौटकर खुशनुमा शाम की तरफ आई, रात फिर कठोरता की आखिरी सीमा पर है। हम हर बार किसी न किसी चीज से चूक जाते हैं, और उस टीस में भीतर भीतर भीगे रहते हैं।
जीवन इतना विशाल है कि बहुत समेटने के बाद भी बहुत कुछ छूट जाता है और जीवन इतना सूक्ष्म और क्षणिक है कि कुछ समेटने का वक़्त ही नहीं मिलता । सब जैसे बदलता जाता है, क्या समय का चक्र यही है जो चलता रहता है ? नहीं नहीं जो पलटता रहता है ?
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मैं लगातार सोच रहा हूँ कि मनुष्य परिवर्तन प्रिय है या जड़ता प्रिय, मनुष्य क्या देखकर परिवर्तन स्वीकार करता है? या किस चीज से ऊबकर जड़ता स्वीकार करता है।
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मैं बातों या भावनाओं को जितना बेहतर लोगों को समझता हूँ उतना बेहतर खुद भी समझ नहीं पाता, मैं हर बार समझाते हुए सोचता हूँ क्या यह सब मैं पहले से समझ गया था ? अगर हाँ तो मैं इतना बड़ा क्यूँ हुआ ? मुझे ये समझदारी और जिम्मेदारी भरे जीवन से कोफ़्त होती है। भरी दुनिया के बीच अपने लिए स्केप लेकर जीने में जो सुख है वो दुनिया भर का दुःख हरने के चक्कर में मन मार लेने में नहीं है।
प्रेमियों को निर्लज्ज ही होना चाहिए, लज्जा में लिपटा जीवन अपने से अधिक और का जीवन बन जाता है।
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रिश्ते जिन शुरुआती बातचीत की सीढ़ी पकड़कर खड़े होते हैं जिस भाव भूमि पर जड़ फैलाते हैं, एक समय के बाद वो उन्हें छोड़ देते हैं, जो व्यक्ति यह स्वीकार नहीं करता, वो पीड़ित रहता है।
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B.com करते हुए एक नियम पढ़ा था, माँग और पूर्ति का अब समझ आ रहा है।
और यह भी कि प्रेम निःस्वार्थ कर्म के समानुपातिक होता है।
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लड़ते रहने में भी सुख है अगर वह मन की कटुता और द्वेष से नहीं, परवाह और चिंता की ओट में हो तो।
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शर्म, झिझक, वस्त्र, छिपाव और ज्ञान के लिए नहीं बनी है, देह सिर्फ देह के लिए बनी है।
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जब जब कोई मेरे विषय में सोचता है, या कुछ देने की बात करता है, मेरे लिए कुछ करने की इच्छा दिखाता है, मुझे लगता है जैसे वह मुझपर दया कर रहा है, मुझे ऐसी बातों पर जाने क्यूँ अति क्रोध आता है, ऐसा क्रोध जिसे मैं कंट्रोल नहीं कर पाता। मैं चाहता ही नहीं कि कोई मेरे लिए कुछ करे बस मैं जिस योग्य हूँ सबके लिए खड़ा रहूँ बस।
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इधर बीच पैंट की जेब खाली है, मन की जेब तमाम द्वंद्वों से भरी हुई है। इतना कि जितनी बार किसी बात में घुसता हूँ मन से कोई न कोई द्वंद्व सिक्के की तरह गिरा देता हूँ, और फिर चिड़चिड़ाता रहता हूँ। चिड़चिड़ाहट इन दिनों मेरा स्वर है। ऊब या गुस्से में मैं एक ही जगह भागता हूँ किताबों की तरफ, आज राजकमल चौधरी की कंकावती पढ़ा, देर तक उस खुमार में रहा, मैं उस व्यक्ति की सच बयानी पर मोहित हूँ, वो कहते हैं –
" अनुभव (या प्रभाव) प्रयोगों के द्वारा प्राप्त नहीं किये जा सकते' - आलबेर कामू के कथन से सहमत होकर भी मैंने अपनी कंकावती के साथ रति-पीड़ा, वंचना, प्रभुता, और पशुता के जटिल-तम प्रयोग किये हैं।
(इनकी प्रतिक्रियाओं को मैंने निर्मम होकर विकट एकान्त में, वीभत्स सह-वास में भोगने और भोग करने की सहज-सरल क्षमता भी प्राप्त की है। मेरे जीने का कारण और उद्देश्य, दोनों ही, मात्र यह क्षमता है।)
ऐसा सच अपने विषय में कौन कह सकता है ?
राजकमल की तमाम बातों में मैं अपना एकाकार पाता हूँ, व्यक्तित्व में अपने भीतर की दबी इच्छा का प्रकट स्वरूप।
मैं भीतर से वह पुरूष हूँ जो अपनी स्त्री के स्पर्श से पल भर की दूरी नहीं चाहता।
अज्ञेय का एक निबंध पढ़ा, काल का डमरू नाद। फिर सब बन्द करके कमरे के बीचों बीच कुर्सी करके बैठा हूँ, कल पूरा घर भरा था यहीं। बैठे बैठे अपनी देह देख रहा हूँ, मैं कभी कभी सोचता हूँ अगर मेरी इस देह को वो नग्न देखेगी या अपनी उंगलियों से छुएगी तो मैं कैसे महसूस करूँगा। मैं महसूस करना चाहता हूँ।
जाने क्यूँ .. मुझे लगता है रति में व्यक्ति को मन की मौत का सा सुख होगा।
― 13 अक्टूबर 2025
❤️❤️
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