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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता...

कितना कह लूँ कितना लिख लूँ कि कहने और लिखने की जरूरत ही ख़त्म हो जाए, मामला बस समझने का बचे, क्या यह सम्भव है ? काश यह सम्भव होता, अगर यह मेरे प्राण की आहुति से भी हो पाता तो मैं तैयार हो जाऊँ बस कैसे भी यह कहने और लिखने की जरूरत खत्म हो जाए, प्रेम को भिखारी की तरह न माँगना पड़े। माँग कर मिली हुई चीजों में सुख भी नहीं होता, हम उसमें सहृदयता खोजते हैं, वह दृष्टि खोजते हैं, वह भाव खोजते हैं जो एक मन ख़ोजता है.. मगर वह नहीं मिलती। मिलेगी भी नहीं। सुख सदा स्वस्फूर्त चीजों से ही मिलता है वो भावनाएं हों या सामान.. दवाब में पका फल सुंदर दिखता है स्वादिष्ट नहीं होता। हम अभी अपने अपने स्वभाव अनुसार अपने अपने वातावरण में पक रहें हैं जिससे हमारा स्वाद बना रहे। 


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फरवरी आने को है..बस दो दिन और..यह पूरा महीना स्मृति का महीना है, जीवन का महीना है। मन इसी महीने की किसी तारीख को अपने स्थायी पते तक पहुँचा था। सम्भवतः इस महीने अकेले रहना पड़े। इन दिनों भी तो अकेले ही हूँ, मगर हम प्रेम में अकेले कब होते हैं ? अकेले होते हुए भी दो का अकेलापन होता है, श्रीकांत वर्मा की कविता पंक्ति को फिर फिर समझने की जरूरत है, वह दुनिया से अकेले होने की बात है अपने से नहीं.. प्रेम अकेले होने का एक ढंग है/ दुनियावी भीड़ से अपने साथी के साथ अकेले होने का... मन ने खूब तैयारी की थी, पर अब छोड़ते हैं। जब एक मन का सुख दूसरे मन के दुःख और अतिरिक्त दवाब का कारण बनने लगे तो उसे छोड़ देना चाहिए। छोड़ देना जरूरी होता है, खुशी दवाब लगने लगे तो उसे छोड़कर ख़ुश होना चाहिए, अनन्तः हम सब अपनी अपनी सीमाएं तोड़ते हैं, इच्छाओं का क्रम देखते हैं, प्रेम में अपने से ज्यादा प्रेमी की इच्छा महत्वपूर्ण होती है, वही एक सम्बन्ध है जहाँ हम किसी के लिए सोचते हैं। प्रेमी जिसमें सहज हो ख़ुश हो वहीं खुश रहना चाहिए। प्रेम देने का नाम है लेने की इच्छा भर आपके प्रेम को सवाल के घेरे में खड़ा कर देती है। 

क्या मैं सवाल के घेरे में हूँ ? 

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मेरा बचपन ननिहाल में बीता था , बहनें और मां पिताजी से दूर मैं वहाँ रहता था, बहनों ने हमें चिट्ठी लिखी थी, आज नाना के घर सफाई में मिली..मुझे छोटी बहन ने फ़ोटो भेजी.. देकर मन इतना ख़ुश हुआ की आसूँ फूट पड़े हैं, ... शिल्पा दीदी लिखी थी, तब वो पांचवी में थी .. दुर्गेश की बहुत याद आती है.. हाए राम..यह मैं महसूस सकता हूँ, यह टीस.. 
               यह बीस साल पहले की चिट्ठी..

याद किया जाना..😢

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कल धार्मिक स्नान की मुख्य तिथि है, श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी है कि हर शहर शोर शराबे जाम से भरे हुए हैं, मन अनहोनी की आशंका से डरा हुआ है शहर में लगभग 5 करोड़ से ज्यादा लोग इकट्ठा हैं कल रात तक और हो जाएंगे सम्भवतः दो गुने.. सब सकुशल सम्पन्न हो, लोग स्वस्थ सही सलामत महाकुंभ स्नान कर अपने अपने घर लौटें यहीं कामना है। सरकार व्यवस्था में फेल हुई या पास यह समय तय करेगा। 
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― 28 जनवरी 2025 / 9 बजे 

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