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आँसुओं की आवाज़

रौशनी की खूब व्यवस्था है, विकल्प ही विकल्प है, सूरज से ही काम नहीं चलाना है फिर भी अंधकार का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। इतनी किताबें, इतने नीतिपरक वचन, इतनी महनीय आत्माओं के संदेश उनका बलिदान आस्था के नाम पर ठगे जा रहे लोगों में रौशनी नहीं कर पा रहीं हैं। शासन प्रशासन या और सारे पुलिस बल भी लोगों की मदद बिना बेकार हैं। और लोग हैं कि उन्हें कुछ दिखता ही नहीं, उन्हें मरने की उत्सुकता है, आस्था का अहंकार है, सनातनी होने दिखावा करना है। कर्म लगभग के अच्छे नहीं हैं, हर दूसरा आदमी तीसरे को नोच लेना चाह रहा है लेकिन सबको लगता है यह सब पाप गन्दी मानसिकता गंगा धो देगी। वो कभी नहीं धोएगी। ऐसी आस्था, आस्था कम मूर्खता ज्यादा है जो लोगो हो तर्कहीन कर दे।  सोचने विचारने की क्षमता सोख ले। ऐसे मति वालों के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है, उनके लिए कुछ भी कर लो सब बेकार है, संत समाज भ्रष्टों से भर गया, वह अनर्गल प्रलाप करता है। अशिक्षित लोगों में रोष पैदा करता है, जिसके लिए करना चाहिए उसके लिए नहीं करता कुछ, वह चाहता है कि लोग उनके चरण वंदन करें, मूल बात से दूर रहें। 

सरकार तो हमेशा से ऐसे मामलों में राजनीति करती है, उसकी अपनी सीमा है वह निरपेक्ष नहीं हो सकती, भावनाओं का ऐसा मजाक उड़ाया जा रहा है कि डर लगता है, लाशों पर दुःख नहीं तुलना की जा रही है, इस सरकार में इतने मरे, उसमें इतने।  लोगों ने गिद्धों को चुनौती दे रखी है। मीडिया तो हद दर्जे की चाटुकर निकली, समय याद रखेगा की यह दौर पत्रकारिता का सबसे बुरा दौर था। 

इसका जिम्मेदार कौन है समझ नहीं आता ? जिसने भीड़ को इकट्ठा किया, या जो भीड़ बनकर गए ? जिम्मेदार दोनों ही हैं, प्रदेश का मुखिया आँसू बहता खड़ा है, अब क्या बोला जा सकता है ? आसूँ हमारे शब्द खींच लेते हैं, हमारे पास शब्द नहीं बचते, चेहरे पर साफ ग्लानि, वह पीड़ा दिख रही है। पर डर लगता है कहीं आसूँ भी तो हथियार नहीं ?  कुछ पल की व्यवस्था की चूक छवि पर हमेशा के लिए प्रश्नचिन्ह लगाकर चली गयी। 

मन बहुत खराब है.. लिखने बोलने को कुछ भी लिखा बोला जा सकता है, पर हासिल क्या है ? 

काश एक दिन धर्मान्धता खत्म हो जाती, लोग अच्छे कर्मों के प्रति आस्थावान होते, सदाचारी हो जाते तो कितना अच्छा होता। 

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कब तक ऊबते, ऊँघते, करवट बदलते जिया जा सकता है, कब तक आख़िर मांगा जा सकता है प्रेम ? कब तक किया जा सकता है त्याग ? क्या इसका कोई बिंदु है ? क्या फल सचमुच मिलता है ? कब तक किया जा सकता है इंतज़ार ? कितनी देर तक रोया जा सकता है ?  या ऐसे भी पूछा जा सकता है आँख कब तक देगी आसूँ, क्या उसे सुख पाने का अधिकार नहीं, क्या उसे अधिकार नहीं ऐसा दृश्य देखने का जो उसे शीतल कर सके ? क्यूँ और किसके लिए मार रहें हैं हम मन को. इसी समाज के लिए ? जिसका कोई नैतिक मूल्य ही नहीं, जिसकी कोई भावना नहीं, जो लोगों को लोग नहीं सामान की तरह देखता है, लोगों को कीड़े मकोड़े की तरह कूचला जाता है। 

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क्या धर्म बिक गया है राजनीतिक हाथों में ? क्या सब व्यापार है, भावना का कोई महत्व नहीं ? कहाँ है वो ईश्वर जो अपने लिए सैकड़ों स्तुति लिखवाता है आरती भोग प्रसाद से खुश होता है, क्या अब वो इतना पिशाची प्रवृत्ति का हो गया है कि उसकी भूख लाशों से ही शांत होगी ? वो तो सब ठीक कर देता है न तो फिर यह ज्ञान क्यूँ नहीं देता की सद्कर्म से पाप धुलते है नदियों से नहीं .. 

हम कितने मजबूर हैं, जिसके नाम पर सब मर रहें हैं हम उसी से करते हैं विनती सब कुछ बचा लेने की ,

हे ईश्वर बचा लो लोगों को...🙏🏻 

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