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दलों के दलदल में

हम पता नहीं क्या चाहते हैं, किस चीज़ को हर चीज़ में ख़ोज रहें हैं जो कहीं मिल ही नहीं रहा है। मन एक व्यक्ति की उपस्थिति और अनुपस्थिति से संचालित होता है। मन एक व्यक्ति की ख़ुशी से खुश होता है उसके दुख में दुःखी। अब तो कुछ मन का भी करता रहूँ तो न जाने क्या सोचता रहता हूँ, मन लगातार चीजों से, लोगों से, औपचारिकताओं से उठता जा रहा है। कहीं आने जाने का मन नहीं करता। तेज बोलते लोगों पर क्रोध इतना आता है कि समझ नहीं आता ये पागल हैं या मैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपयोग करने का बिल्कुल मन नहीं करता, करता भी हूँ तो बिल्कुल स्तब्ध सा जकड़ा हुआ बैठा रहता हूँ। मुझे कभी ऐसे बिल्कुल जॉली टाइप महसूस नहीं होता, कभी भी नहीं लगता कि सब बहुत हल्का है, मन बस चुप रहने का करता है। या न्यूनतम बोलने का। मैं जानता हूँ ऐसे तो सामान्य जीवन जीना बड़ा मुश्किल होगा, मगर क्या करूं समझ नहीं पाता ? क्या मुझे जीना नहीं चाहिए?


पिछले 15 सालों में जितना साहित्य पढा वह कहीं जमीन पर नहीं दिखता कोई बदलाव नहीं होते, साहित्य लिखने वाले ही उन्हीं लिप्साओं में उलझे हैं, लोगों की नज़र में अब मनुष्य मनुष्य बाद में है पहले कोई न कोई संगठन है, साहित्यकार तो अब मरते आदमी के खून से पहले उसके दल की शिनाख्त करते हैं फिर अपने दल का हुआ तो मदद करते हैं वरना उसकी तस्वीर लेकर लिखते हैं क्यूँ नहीं आए फलाँ फलाँ.. मन ऐसी तमाम बातों से इतना छलनी हुआ रहता है कि व्यक्तिगत जीवन में दुख नहीं होते हुए भी मन दुःखी हुआ रहता है। 

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हमने क्यूँ बना लिए हैं इतने चश्मे कि साफ देखना ही मुश्किल हो गया है ? 

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ऐसा क्यूँ होता है कि हम जिसके लिए सबसे ज्यादा एफर्ट करते हैं उसके ही साथ सबसे कम रह पाते हैं ? आधे जीवन साथ रहने की तैयारी करते हैं आधे जीवन कुछ और फिर जीवन ही नहीं बचता न हम, हम प्रेम करने के ज्यादा दीवार के भीतर प्रेम सहेजना चाहते हैं जिससे न दीवार कभी बन पाती है न प्रेम ही सहेजा जाता है, हम एक दिन अपनी अधूरी इच्छा के साथ मरते हैं। 

मुझे वो अधूरी इच्छा के साथ मरने वाला दिन दिखता है। 

― 20 / 01 / 2025 / शाम 7 बजे

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