तमाम प्रश्न हताशा से गहरे हलक से हाँफ रहें हैं, उनका उत्तर कहीं दबा दिया है, वह निकलेगा, मगर कब ? यह पता नहीं। मगर निकलेगा जरूर, उत्तर छिपते नहीं हैं, उन्हें दबाया जा सकता है, दबी हुई चीजें जब फूटती हैं तो पूरे जोर से फूटती हैं फिर उन्हें कोई नहीं रोक पाता।
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जीवन अलग अलग भावनाओं का कोलाज है, लेकिन क्या यह तय नहीं की कोलाज में कितनी भावनाएं हो सकतीं हैं ? हम ऐसा क्यूँ नहीं कर सकते कि हम अपने मन अनुरूप भावनाएं रखें और सबको निकाल दें। काश ऐसा हो पाता तो मैं अपने को झाड़ देता जैसे कपड़े धुलने के बाद धूप में डालने से पहले झाड़े जाते हैं। कुछ तो भार कम होता, कुछ ही सुखाना पड़ता सूर्य को।
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हर कोई अपनी अपनी मूल पहचान खो रहा है, ईश्वर खो रहें हैं ईश्वरत्व, और मनुष्य अपना मनुषत्व
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यह वर्ष निराशाओं से शुरू हुआ था, पिछले वर्ष और उसके पिछले वर्ष की इच्छाओं को इस वर्ष भी उम्मीद के सूत से बांधे आया था कि यह वर्ष अपना होगा वह करूँगा जो चाहता हूं, उसके साथ रहूँगा जिसके साथ रहना चाहता हूँ, पर कुछ नहीं हो सकता दिख रहा है...
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आ गयी फरवरी... यह भी यूँ ही तड़पते इंतज़ार करते मन मसोसते बीतेगी।
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क्या इस वर्ष भी......
नहीं कुछ नहीं
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सच कह गया है नीत्शे ; God is dead
तो फिर क्यूँ बची है पृथ्वी ? क्यूँ बचे हैं लोग ? क्यूँ बची है इच्छा, उम्मीद ,सपने , प्रेम, लालच ? किसके लिए कर रहें हैं लोग इतने अनुष्ठान , दान, तप और व्रत ?
कौन है जो अभी भी खींचे हुए है सबको ?
― 31 जनवरी 2025 / 8 :30 शाम
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