एक अजीब सी कोफ़्त एक चिढ़न थकान सा कुछ मन में हावी है, समझ नहीं आ रहा है क्या करूँ ? कैसे मन को समझाऊँ ? जहाँ हूँ वहाँ हूँ नहीं, जहाँ नहीं हूँ वहां होने की इच्छा यहाँ होने नहीं दे रही है, भीतर कुछ कचोट रहा है। मन ...
मौत मजाक बनकर रह गयी है, लोग धर्मांध हो गए हैं, उन्हें दिख रहा है आगे कुआं है फिर भी कूदे जा रहे हैं। कुछ बोलो तो गालियाँ सुनो.. क्या किया जाए ?
क्या मौन रहा जा सकता है ? बाहर से तो रहा भी जा सकता है, भीतर ? कैसे ?
ऐसे समय में सोना गुनाह है, नींद तो यूँ भी नहीं आनी है।
― 30 जनवरी 2025 / 8:30 शाम
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