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टूटने पे आए तो कोई ऐसे टूटे

हर दिन एक नए टुकड़े में टूटते हैं और देखते हैं कि कोई उसमें देख रहा है खुद को फिर उस टुकड़े को जोड़ते नहीं कि उसकी छवि न बिगड़े, हम अपने को बिगाड़ लेते हैं, इस सिलसिले में एक टुकड़े भर भी नहीं बचे हैं। जैसे एक बड़ा सा आईना टूटे तो कई छोटे छोटे आईने हो जाते हैं वैसे ही एक जीवन टूटे तो वह भी कई जीवनों को जीवन देखने भर की सहजता दे देता है। हम वैसे ही हो गए हैं।

मन की तरह मेरी कलम की इन दिनों हताश है लगभग टूटी हुई सी, सोचता कुछ हूँ लिखता कुछ हूँ। चाहता हूँ कुछ कहता हूं कुछ, स्वीकार कुछ और करता हूँ 

कुछ आने की आहट में जो उत्सुकता और आकुलता जन्मती है, वो उसके जाने के बाद एक गहरी वीरानी के रूप में उभरकर हृदय पर छा जाती है। मन कहीं का होकर भी कहीं का नहीं होता। हँसने हँसाने के हर जतन बोझिल लगते हैं। चाह की राह पर मन न होते हुए भी डाइवर्जन का साइन बोर्ड लगाना पड़ता है। आप देखते हैं कि वो रास्ते और लोग अंजान से हो गए हैं जिन्हें आप जानने का दावा करते रहे हैं। भरी भीड़ में आप अकेले खड़े हैं अपने किए कर्मों की डायरी लिए हुए जो आपने औरों के लिए किए थे। जिसके आप भी हकदार थे, लेकिन आया आपके हिस्से कुछ नहीं सिवा एक वीरानी के जो आपने नहीं चुना था और अब आपको उस वीरानी के मैदान को उत्सवों के लॉन की तरह देखना है। पसीना छूटने तक नाचना है। 

क्या यह सच नहीं कि हमारे पास जितने विकल्प होते जाते हैं हम उतने अकेले होते जाते हैं ? पहले साल भर में गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर जाकर साल भर की ऊब मिटाकर नयापन ले आते थे अब हर दिन कहीं न कहीं जाकर भी ऊब नहीं मिटा पाते। हम जाने किस सच से भाग रहें हैं..? हम जाने किसके लिए जी रहे हैं हम अपने अपने उद्देश्यों से भटके हुए लोग हैं.. हम सब अपने अपने मनों की चिता पर खड़े हो हँस रहें हैं।

फ़िराक़ साहब का एक शेर जाने क्यों आज याद आ रहा है, जैसे मन को दो पंक्तियों में कहने का साधन मिल गया है, मेरे इतने कहे पर उनका वो दो मिसरा काफी है कहते हैं ― 

अभी तो कुछ ख़लिश सी हो रही है चंद काँटों से
इन्हीं तलवों में इक दिन जज़्ब कर लूँगा बयाबाँ को


– 23 नवंबर 2025 

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