आज मेरा जन्मदिन था। लगभग और दिनों की तरह ही बीता , कुछ प्रिय जनों ने विशेष महसूस करवाया।
विशेष होने की अनुभूति से बचते हुए भी विशेष होने की अनुभूति घेर ही लेती है। यह अनुभूति भीतर अजीब सी चुभन पैदा करती है तब और ज्यादा जब आप जानते हों कि आपने साल दर साल असफलता की एक ऊँची इमारत खड़ी करने के अलावा कुछ विशेष नहीं किया है।
सुबह से कई सारे फोन आए कुछ उठा सका कुछ नहीं। सैकड़ों मैसेज, और स्टोरीज के जवाब अब भी बचे हुए हैं। सबने याद रखा। सबने प्यार दिया। फिर भी पूरा दिन एक अजीब-सी खाली जगह बनी रही, जैसे कोई मेरे सीने में बड़ा-सा छेद कर गया हो और उसे कोई देख ही न पाए।
सुबह देर से सोकर उठा, लगभग दोपहर में, फिर और सो गया तो चार बज गए, दिन बिल्कुल सुखद रहा, दिनों बाद सुख की नींद नसीब हुई। शाम को रोहित लोग आए तो बाहर गया, सब किताबें लेकर आए थे, मैं उन सबका प्यार देख भावुक हो गया, अभी सब बेरोजगार हैं और इतना प्रेम..मैं कुछ नहीं कर सका आजतक उन लोगों के लिए।
केक कट किया गया, तस्वीरे ली गईं, हँसी हुई और फिर सब अपनी अपनी दुनिया में। अब कमरे में मैं अकेला बैठा हूँ। केक का आधा हिस्सा फ्रिज में पड़ा है। बाकी बर्तन धुले नहीं। किताबें मेज पर वैसी ही पड़ी हैं। उम्र बढ़ती जा रही है। और मैं छोटा होता जा रहा हूँ। हर जन्मदिन पर लगता है कि एक साल और कम हो गया। और मैंने अभी तक कुछ शुरू भी नहीं किया।
सम्भावित के किनारे कहीं असंभावित सा जीवन है और इस जीवन में सब कुछ लगभग असंभावित है। इस असंभावित में महक भर देने वाले मन और हृदय ने जो कुछ कहा उसे मैं कह नहीं सकता। दिन भर एक महक के साए में रहा, आँखें भारी होने के बावजूद आँसू उतर नहीं पाए। इस सामान्य को विशेष बनाने वाले हर हाथ और मन को शुक्रिया
― 22 नवंबर 2025
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