अंधेरा ही अंधेरा दिखता है। किसी पेशाबघर में खड़ा होकर लड़ रहा हूँ अपने आसपास निवृत्त होकर जाने वाले हर उस आदमी से जो फल्स नहीं दबा रहा है। आज शायद चौथा दिन है। और जाने कौन से नम्बर का सपना है यह जो अभी अभी आपने पढ़ा। इससे पहले मैं अलग अलग सपनों में भी हकारता हुआ चिल्ला ही रहा था किसी को, कहीं गहरी अंधेरी गुफा में फसा हुआ हूँ और आगे निकलने का जतन कर रहा हूँ कुछ जानवर भी मेरे साथ फसे हैं, उनमें एक छोटा पिल्ला है, जो मेरे बचपन में घर पर था, तब मैं 6 वर्ष का रहा होउँगा, अंशुमान भईया उसे साइकिल पर पीछे बिठाकर ले जा रहे थे बाग की तरफ से और उसका पाँव चक्के में फंसकर टूट गया था, बड़े पापा ने उसको प्लास्टर करके बांस की फट्टी से जोड़ दिया था। वो फिर चलने दौड़ने लगा था। बहुत सुंदर था वो। वो उसकी टूटे पैर के साथ मेरे पास खड़ा है मेरा पैंट खींच रहा है और कुं कूँ कर रहा है, मैं इरिटेट होकर चिल्ला रहा हूँ जैसे सब मनुष्य हैं जो मेरी बात समझ लेंगे। शायद इसे ही बुखार सिर पर चढ़ना कहते होंगे। तो क्या श्रीकांत वर्मा को भी बुखार सिर पर चढ़ गया था ? ऐसी कविता पागलपन में ही लिखी जा सकती है।
दो दिन तो बुखार इतना तेज था कि अपनी ही देह देखकर लग रहा है यह किसी और की है, हाथ और होंठ काले हो गए हैं, सीने से नीचे और कमर से ऊपर जितने भाग को पेट कहते हैं वो एकदम साफ है, जहाँ जहाँ मुड़ता है वहाँ लालिमा सी है। हर मांसपेशी में ऐसा दर्द है कि क्या कहूँ, मुझे उन दिनों की याद आई जब घर की लाल गाय भागी थी उसे पकड़ने मैं उसके साथ भागा और पगहा में हाथ फँस गया दूर तक घिसट गया था, देह में ऐसा कोई अंग नहीं बचा था जो कटा न हो। उसमें मेरा एक पसंदीदा पैंट भी कट गया था। पैंट इसलिए याद है क्योंकि मुझे हाफ पैंट पहनना कभी पसंद नहीं था। पर बचपन में पहनना पड़ता था। पापा उसे पहली बार लाए थे 2006 में नौकरी लगने के साल भर बाद हल्के हरे रंग का था। महीनों लगे थे मुझे उसे भूलने में। जाने क्या क्या याद आ रहा है।
इस चार दिन में ऐसे कई काम छूट गए जो कर सकता था, कुछ लोग जो किसी काम के लिए ही फोन करते हैं उनका काम करने की इच्छा भी हुई पर बुखार ऐसा रहा कि नहीं कर सका। सोच रहा था फोन करके कह दूं ऐसी दिक्कत थी इसीलिए नहीं कर सका, फिर मन ने कहा उन्होंने तो तुमसे पूछा नहीं था कि तुम ठीक हो कि नहीं..
कल दिन की एक घटना पर दिन भर मन कोफ़्त से भरा रहा, सोचता रहा लोग कितने दोमुहें क्यूँ हैं? यही लोग हैं जो किसी को हिटलर कहते फिरते हैं और जब कोई इनपर सच कह देता है तो उसे अपने अनुरूप तोड़ मोड़ पर पेश कर देते हैं। देश झूठ बोलने वालों से ज्यादा सच को सहन न कर पाने वालों ने बर्बाद किया है। इसमें नेता आत्ममुग्ध शिक्षक और पत्रकार सबसे अव्वल हैं।
इन दिनों दिनभर लेटा रहता हूँ, रमेशचंद्र शाह का उपन्यास 'कथा सनातन' पढ़ना शुरू किया था आज समाप्त हुआ। उपन्यास का केंद्रीय चरित्र 'सनातन' अपने जीवन की सत्तरवीं दहलीज़ पर खड़ा होकर अपने अतीत और उससे मिले अनुभवों का निरपेक्ष भाव से मूल्यांकन करता हुआ दिखता है। उसका आत्म-निरीक्षण केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानव जीवन से जुड़े सनातन प्रश्नों जैसे जीवन का उद्देश्य, नियति, और दर्शन तक जाता है। इसमें भारतीय दर्शन परम्परा की बात तो है ही लेकिन जो अलग है वह ये कि इस उपन्यास में आम हिंदुस्तानी की चेतना में रचे बसे आत्मज्ञान की अवधारणा पर बात हुई है। अपने आप से जूझते आदमी के लिए यह जरूरी उपन्यास है। बहुत छोटा सा है, मैं अस्वस्थ होने की वजह से चार दिन में पढ़ पाया।
मन में लगातार एक सवाल चल रहा है कि कालिदास के ऋतुसंहारम और बिहारी के काम विषयक दोहे इतने शब्द दर शब्द क्यूँ मिलते हैं ? क्या यह परंपरा के अनुपालन की वजह से है या एक खींची लकीर के आगे न निकल पाने के कारण ? कालिदास और बिहारी के लिखे में यह बहुत सघन रूप में दिखता है। विद्यापति में अलग होता है थोड़ा। पर बहुत नहीं। कभी लिख पाया तो लिखूंगा।
आज केशव तिवारी दादा का फोन आया था उनसे विंसेंट की जीवनी पर बात हो रही थी तो उन्होंने रचना और व्यक्तित्व के कुछ जरूरी मुद्दों पर सुंदर बात कहीं, जैसे मैं उनसे कहता हूँ दादा आपका उज्जडीपन आपके लेखन में साफ जाहिर होता है वहाँ पेशेंस नाम की चीज़ नहीं है। वो हँस पड़े। हम दोनों एक बात पर सहमत हुए की 'कला का काम बांधना नहीं खोलना है, लीपना नहीं उघाड़ कर सच सच रखना है।'
― 27 अगस्त 2025
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