सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ।

साँस रुकने से पहले पहले, सारी राह चल लेना चाहता हूँ, सारी दुनिया एक बार देख लेना चाहता हूँ तुम्हारे साथ.. अकेले नहीं। आदमियों को भले न देखूँ पहाड़ों और नदियों को छू लेना चाहता हूँ, हर तरह की जमीन का पेड़ लगा लेना चाहते हूँ उस घर में जहाँ तुम रहोगी, हर तरीके से कर लेना चाहता हूँ इज़हार, ताकि मरते वक्त मन आश्वस्त रहे कि कर पाया हूँ वैसा प्यार जैसा सोचता था, रह पाया हूँ उतना समर्पित जितना इस युग में रहा जा सकता है। बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी चाह बना रहूँ मैं जब तक है मुझमें चेतना.. 

इतना तो चाहा ही जा सकता है न ? 

*************
उस शहर में हूँ जहाँ रहकर वह नहीं कर पाया जो करने का सोचकर आया था, लखनऊ यूनिवर्सिटी के पीछे और महमूदाबाद हॉस्टल के सामने देर तक खड़ा रहा, वहाँ से पैदल बढ़ा कपूरथला चौराहे तक, एक कैफे में चाय पी, यूनिवर्सल बुक सेंटर गया कुछ किताबें ली, फिर वहां से पैदल ही पापा के ऑफिस की तरफ गया , पब्लिक लाइब्रेरी के सामने दो पल रुका, उस जगह जाना चाहता था पर नहीं गया, वो कोना निहारा जहाँ साइकिल खड़ी करता था, ठीक ठीक ढंग से साहित्य यहीं पढ़ा था, मन भर, 
अमीनाबाद की एक गली में घुसा, बाज़ारो में रंग तभी दिखता है जब साथ स्त्री हो, आदमी क्या ले लेगा, चूड़ियां, झुमके, दुप्पटे, चप्पलें, साड़ियां, देखता हुआ निकल गया, शोर बहुत था, जाम से पटी थी सड़क, और ऐसी कोई आवाज तो साथ है नहीं जिसके लिए इन आवाजों को सह लिया जाए। 


मैं चलता रहता हूँ, जो जो देखता रहता हूं, सोचता रहता हूँ यह उसे देखना था, यह उसके लिए लेना था, मैं खुद भी तो... 


************
अपने लिए जीने का तमाम अर्थ तुम्हारे लिए जीने से खुलता है। सांस लेना और तुम्हारे बारे में सोचना दोनों एक बात है। 
**************

प्रेम आदमी को धैर्यवान बनता है, सहनशील बनाता है, वह हँसकर सुनने लायक बनाता है जो सुनकर वो लड़ पड़ना चाहता है। 

****************
पिताजी का वजन घटता जा रहा है, उन्हें भीतर ही भीतर क्या खा रहा है समझ ही नहीं आता, अब जबकि वह अपने दोनों बड़े दायित्वों से मुक्त हैं, मैं जितना कर सका किया कि उन्हें कहीं दौड़ना न पड़े, हाँ, आर्थिक मदद नहीं कर पाया..उसकी टीस है, खाना खाते और रास्ते में पैदल चलते बस उनकी सारी बात मेरी शादी पर टिक गई थी, कह रहे हैं कुछ नहीं तो अगले साल सगाई तो कर लो...मैं क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आता, यह अकेले का फैसला थोड़ी है, कैसे ले सकता हूँ, स्थिरता तो है नहीं... कितनी बातें हैं खैर! 
***************

एक अजीब सी थकान हावी है , कैसी पता नहीं। 

**************** 
तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ। 

― नासिर काज़मी 

― 5 फरवरी 2025 / 9:30 शाम 

टिप्पणियाँ

  1. भैया कितना सुंदर लिखते है आप। काश भारत देश मे केवल लिखने से जीवन की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो पाती। बाकी पापा का कहना भी उचित है।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होने और न होने के बीच की याद

बहुत कुछ पूरा होता है तब भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। कई बरस पहले ही किसी कविता में कहा था 'नमी जब ज्यादा हो तो बीज उगते नहीं हैं सड़ जाते हैं' उसे फिर फिर महसूसने का दिन रहा। पिछले 24 घण्टों में कई बार डायरी खोले बैठा। बैठा ही रहा। एक शब्द नहीं लिख पाया। आत्माख्यान, आत्मलीन और आत्मरत होकर नहीं लिखा जा सकता। अपने से अलग होना पड़ता है। नहीं लिख पाया। एक शब्द भी नहीं। एक ख़ालिस डॉट या पूर्णविराम भी नहीं। कागज कोरा का कोरा रहा। हाँ, दो चार बूंद आँसू जरूर गिरे। फिर उस पर कुछ लिखा नहीं। तारीख़ डाल दिया अभी। और पन्ना बदल दिया। कोई कभी पढ़ पाया तो वही जान पाएगा वह जो उसपर सम्भावित था लिखा जाना। शायद नहीं जान पाएगा। नहीं जान पाएगा तो मेरा ही फायदा है। यूँ भी तो मेरा मन सबका मन रखने के लिए बना है। मेरा मन कहीं कोने में रख दिया गया था बरसों पहले। कौन जतन करेगा उसे उठाकर झाड़ पोंछ कर देखने की। मैं खुद भी नहीं करता।  अपने हाथ से बिछाए फूल अपने ही हाथ से समेटे। समेटते हुए वह मखमली नहीं लग रहे थे। कँटीले भी नहीं थे। सब वैसे का वैसे रख दिया। बिल्कुल यंत्रवत रहा। कपड़े निकाले सिरहाने रखी कुर्सी पर र...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...