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निरर्थक का अर्थ


यात्रा जारी है। यह मेरी यात्रा नहीं है। भविष्य के गर्त की ओर जाने की यात्रा है। मैं किसी गोल पिण्ड की तरह रफ़्तार में मौत नाम की खाई की तरफ लुढ़क रहा हूँ। तुम कहीं बीच में मिलोगी। फिर हम साथ लुढकेंगे। लुढ़कना रुकेगा नहीं । 

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बहुत ज्यादा सोचता हूँ पर बोलता हूँ बहुत कम। जब बहुत बोलता हूं तो बिल्कुल नहीं सोचता। बोलने के बाद सोचता हूँ ज्यादा तो नहीं बोल गया, फिर ख़ुद पर शर्मिंदा होता है , माफ़ी मांगता हूं। फिर तब तक चुप रहता हूँ जब तक अपने होने की याद बनी रहती है। 

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सुबह उठते ही पाँव फोड़ लिया। हड़बड़ी मेरी मेरे लिए हर बार खतरनाक हुई। पिताजी को परेशान किया वो स्टेशन आकर खड़े थे। फिर बताया बस से आउंगा तो लौटकर गए। फिर आए घण्टे भर बाद। यह चोट से ज्यादा पीड़ादायक था। साथ जाने की बात थी अकेले गया। अकेले अकेले अकेले ही रहा।


वर्तिका जी से मिला। कोई साहित्यिक बात नहीं हुई। पढ़ाई लिखाई नौकरी घर गाँव की चर्चा हुई। उनमें एक अजीब छटपटाहट है। न जाने कैसी। जैसे वह जानती नहीं उन्हें क्या करना चाहिए। लिखना ठीक है उनका। और ठीक हो सकता है। रवि के सत्कार ने मन मोह लिया। उसे कुछ देना चाहता था पर नहीं दे सका। एक फूल का पौधा दिया। केतन से बातचीत हुई कुछ दुनियावी। मैं बोलते हुए पीछे की राजनीति और आगे की हानि लाभ सोचे बिना बोलता हूँ । अगर आपको यह स्वीकार है तो आपकी ही बेहतरी है मेरा कोई फायदा नहीं। 

कैफ़ी आज़मी एकेडमी गया। 2022 दिसम्बर के बाद फिर कविता पढ़ने मंच पर खड़ा था। अब हाथ पाँव नहीं काँपते। कुछ भी और कैसे भी बोल सकता हूँ । सबने कविता पढ़ी। अच्छी कविता। राजनीति हर कविता के मूल में थी। प्रेम कविता में भी राजनीति और राजनीतिक कविता में प्रेम खटकता है। दरअसल बिल्कुल बेकार लगता है। कवि जब यह करता है तो वह अपना कवित्व खो देता है। तुकबंदी का दौर उठ गया है । छंद के नाम पर रद्दी तुकबंदी चलाने के प्रयास ने हिंदी कविता का बंटाधार कर दिया है। पुरुष कवियों में क्रंति और स्त्री कविताओं से चांद तारा जुगनू और मम्मी दादी को हटा दिया जाए तो कविता में कुछ बचती नहीं है। कन्सट्रक्टिब कविता का दौर है यह। मैं बिल्कुल बेकार वाचन करता हूँ। मैं जल्दी निपटने के चक्कर में फंस जाता हूँ। मैं कविता पढ़ना खासकर बन्द कमरे में अपनी ऊर्जा को निरर्थक लगता है। 

गौहर रजा ने थोड़ा थोड़ा भटकता हुआ मगर अच्छा वक्त्व दिया। उन्होंने एक बात कहीं की उन्होंने 30 साल से लगातार कुम्भ पर अध्धयन किया। हर साल की खोज उनकी उम्मीद से बिल्कुल अलग जाती थी। पर इस बार वो अचंभित थे कि लोगों का भरोसा अंधविश्वास पर नहीं विज्ञान पर अधिक था। उन्होंने कहा अब धर्म सांस्कृतिक नहीं बचे हैं  राजनीति धार्मिक हो गया है। उनका लहजा बड़ा सुंदर था। पर वो एक समुदाय से आगे नहीं बढ़ते उन्होंने बाबा दिखते हैं मौलाना नहीं। ख़ैर ! सबकी अपनी टॉर्च है वह बेच रहा है। 

कार्यक्रम के बात बेवजह की बतकही हुई। मैं दारू शराब सिगरेट में रहता नहीं तो निकल आया। धुंआ भी नहीं पी पाता तो चाय भी अकेले रवि के साथ पिया। पुलिस लाइंस के अंदर। जहाँ लखनऊ आने पर शुरुआत में पीता था राजीव के साथ। कहीं और नहीं गया। जाता। तुम होती तो। सोचा तो तुम सामने बैठकर सुनोगी मुझे फिर तुमसे पूछुंगा कमी बताओ। सच तुम्हीं बोल सकती हो। और तो सब .. 

तुम कहाँ हो ? 

लौट रहा हूँ। रास्ते में हूँ। सर फट रहा है। मुझे बन्द गाड़ियों से बड़ी दिक्कत होती है। हो रही है । 

― 2 मार्च 2025 / 9 : 20 रात 


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