जब दो जीवन के बीच वैसा चुम्बकत्व न हो जैसे होना चाहिए तो अपने जीवन को दूसरे जीवन से किनारे कर लेना ही उचित होता है। एकतरफा एफर्ट करता व्यक्ति हमेशा हृदयाघात से मरता है। यह सामान्यीकरण नहीं है, बस विचार है जिसे लक्षणा में समझने की जरूरत है।
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दिन ब दिन लिखे जा रहे साहित्यिक और दार्शनिक बातों का क्या अर्थ जब समाज को गंदे नाले की ही तरफ बढ़ना है, हम क्यूँ लगाएँ फूल जब उसे कोई देखने वाला ही नहीं। होने का महत्व तो तभी है न जब होने का कुछ सार्थक परिणाम निकले, नहीं तो होने और न होने में भेद क्या ?
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हम जिस चीज़ से सबसे ज्यादा भागते हैं जो चाहते हैं यह नहीं करूँगा, यह नहीं लिखूंगा वही होता है, जिन दिनों में हम बस मजबूत और हँसमुख दिखते रहना चाहते हैं उन्हीं दिनों में उदासी सबसे ज्यादा घेरती है। तमाम इच्छाएँ उसी दौरान हमें जकड़ती हैं जब हम इच्छाओं से मुक्त होने की राह ख़ोज रहे होते हैं, इसका कारण क्या है पता नहीं ?
अभी जो मैं इतना सब सोच रहा हूँ यह भी तो बेअर्थ ही है, सत्य इन सबसे बिल्कुल अलग है, मैं लिखने को लिख दो दूँ, मुझे किसी की याद नहीं आती, मैं नहीं ऊबता एक पल को भी, मैं नहीं होना चाहता हूँ कुछ भी, मैं रह लेता हूँ अकेले, दिलासा भी दे लेता हूँ अरे पिताजी तो चालीस सालों से रह रहें हैं अकेले, माँ भी उतने ही समझो पति के बिना और किसी उपस्थिति का कोई विशेष महत्व होता नहीं, तो तुम तो अभी कुछ नहीं हो , पर फिर मन पूछता है ऐसे जीवन का मतलब क्या है ऐसे ही रहना है तो जीना ही क्यूँ है ? हम सब एक ही चीज़, जिसे साथ कह सकते हैं रहने के लिए अलग अलग क्यूँ रहते हैं?
अब यह सब जो लिख गया है मैं नहीं सोच रहा हूँ, दरअसल कलम अपनी राह ख़ुद बनाती हुई यहाँ तक आयी है.. मैं तो वहीं हूँ..वहीं..
― आशुतोष प्रसिद्ध
बहुत बढ़िया लिखा आशुतोष
जवाब देंहटाएंभावनायें ये यही है अपनी भी
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