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दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए

चुप होने से पहले हम बहुत बोल रहे होते हैं। हम अचानक से चुप नहीं होते हैं, एक प्रक्रिया के तहत धीरे धीरे किस्तों में चुप होते हैं। कभी अनसुना किए जाने से, कभी अपने बोले को बेअसर होते देखने से और कभी कभी अपने बौद्धिक दबाव से.. यह सब बहुत मध्यम गति से होता है, जब तक हमें आभास होता है तब तक वह हमारी पहचान बन चुका होता है। हम गढ़े जाते हैं किसी और के मन और बुद्धि के साँचे अनुरूप, हमें चुनने की आज़ादी नहीं होती, हमारे लिए जो चुना जाता है उसे ही हमारी आज़ादी कहकर हमें पकड़ा दिया जाता है।

हम किसी को मन भर गले नहीं लगा सकते, उसे चूम नहीं सकते क्योंकि हमें वह सुचिता से जोड़कर बताया गया, जबकि हम बने ही दो देहों के मिलन से हैं। हमें बहुत सामान्य सामान्य सी बातों को भी इतना आदर्शीकरण करके बताया जाता है कि जब हमें ऐसा कुछ जीने को मिलता है तो हम अपने दिल और दिमाग के द्वंद्व से ही थक जाते हैं और उसे धकिया देते हैं जिसे समेट लेना चाहिए था। दर'असल यह परवरिश की खामी है। हमें जिन्हें खोलकर रखना चाहिए हम उसे ढंककर रखते हैं जो खुला रखना था वह ढंककर। कह देने पर यह बात स्वीकार नहीं की जाती है। जैसे मैं नहीं स्वीकार कर पा रहा हूँ अपने ही हाथ से हुई खामी को.. क्योंकि मुझे वैसा ही सिखाया गया, दबकर रहना, स्थाई जीवन का सुख देखकर चलना चाहे जीवन के अगले क्षण का भरोसा न हो.. अपने मन को परिवार के लिए मार देना ही अच्छे आदमी का धर्म है  भीतर रोते भी रहो तो बाहर मुस्कुरा कर निकलो, हमें अच्छे बने रहने का ढोंग करते रहना होता है हर पल, यह सब क्यूँ है ? मुझसे ग़लती हुई, मैं स्वीकार करता हूँ। मुझे माफ़ करना बहन..  मैंने बाहरी व्यक्ति देखा, भीतर का मन देख ही नहीं पाया। व्यक्ति के भीतर देखे कैसे ? क्यों बने हैं इतने आवरण ? अब मारे पछतावे के ख़ुद से नज़र नहीं मिला पाता। अब वही जानें.. 

मैं ख़ुद को कुरेद नहीं रहा, अनगिन कुरेदे से हुए घाव को सहला रहा हूँ, सम्भवतः इससे घाव की कलबलाहट कुछ कम हो। 

सम्भवतः ... 

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पहले की गुरुकुल प्रणाली ही शिक्षा के लिए ठीक थी जब शिक्षा दान थी, शिक्षा मुफ्त थी।  अब तो सब व्यापार है, रोज नए नए नियम बन और बदल रहें हैं कुल मिलाकर प्रयास क्या है यह स्पष्ट दिख रहा है। लोगों का मुँह तो सिल ही दिया गया है, लिखने पढ़ने पढ़ाने की क्षमता को नष्ट करने का सारा प्रबंध कर लिया गया है। हम धीरे जाहिलियत के युग में प्रवेश करेंगे, जहाँ बौद्धिकता का आकलन इस बात से होगा कि आप शासक का तलवा कितने सुंदर ढंग से चाट सकते हैं। 

आपकी जीभ जितनी कम खुरदरी होगी आपकी उन्नति उन्नति उतनी ज्यादा होगी। कमोबेश हो अभी भी यही रहा है, जाति देखकर नम्बर दिए जा रहें हैं, गणित बिझाकर शोध में दाखिला लिया दिया जा रहा है, प्रोफेसर और गेस्ट प्रोफेसर के लिए लाखों में बात चल रही है, और कई बार तो बस आपका हाफ पैंट वाला या सितारे वाली टोपी और झोला लटकाकर चलने वाला, या आगे पीछे दिखना भर बहुत होता है। एकेडमी की दुनिया दलदल होती जा रही है, हो गयी है। हद यह है कि मैं भी उसी दलदल की तरफ हूँ मेरा परिवार भी.. 

ध्यान से देखें तो अर्थ प्रप्ति के सारे रास्ते ही किसी को दबा लेने वाली, ठग लेने वाली, और मूर्ख बना देने वाली राह से जा रहा है। 

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परिष्कार बड़ा जरूरी है,हर चीज़ का, किसी को देवता बना देना उसके विकास को रोक देना है, देवता को भी। 

हमें आदिकवि पर भी सवाल करना चाहिए और आज के कवि पर भी, पूजना ठीक रास्ता नहीं है उन्हें समझने और अपनाने का । 

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इंतज़ार करते हुए दिन क्यूँ नहीं कटते ? हम इंतज़ार ही क्यूँ करते हैं जबकि अन्ततः होना वही है। इंतजार के बाद मिला समय इतना तेज बीतता है कि लगता है हम इंतज़ार में उस व्यक्ति को ज्यादा जिए साथ में कम। सच ही कहा है अमीर मीनाई साहब ने ;- 

 ' वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर / दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए ' 

― आशुतोष प्रसिद्ध 

डायरी / शाम 6 : 20 / 9 जनवरी 2025



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