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मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ..

जिससे बात करने की सबसे गहरी इच्छा रहती है, उसी से बोलने को मेरे पास कोई शब्द ही नहीं होते, मैं चुप सोचता रहता हूँ कि क्या ऐसा बोलूं की उसे मेरे भीतर की ऊब का तनिक भी आभास न हो, उसे लगे न कि मैं उसका इंतजार कर रहा था, उसे न लगे की उसके बिना कितना अकेले हो जाता हूँ मैं.. जितनी देर वह नहीं रहता मैं उसे इतना सोच लेता हूँ इतना महसूस लेता हूँ , इतना बतिया लेता हूँ कि जब पास होता है तो सब शांत हो जाता है बोलना बहुत चाहता हूँ पर नहीं बोल पाता, शिकायत करना चाहता हूँ पर डरता हूँ, कहीं... 

समझाना जितना आसान है समझना उतना ही मुश्किल 

मैंने कई लोगों को समझाया रिश्तों के बारे प्रेम के बारे में जीवन की अनिमितताओं के बारे में पर अपने को समझा नहीं पाता, जीवन की तमाम योजनाओं का इच्छाओं का सामुहिक रूप से अंत हो रहा है, औरों से हँसकर कहता हूँ अरे सब अच्छा है.. पर जब ख़ुद से पूछता हूँ तो..हर बार कुछ जैसे हाथ से छूट जाता है, मैं भरभरा के रो पड़ता हूँ,

 सुबह माँ पूछ रहीं थीं आँख क्यूँ सूजी हुई है मैं सच नहीं बोल पाया, झूठ बोल दिया की ज्यादा सो रहा हूँ आजकल न तो इसीलिए होगा। 

मैं धीरे धीरे कितना झूठा होता जा रहा हूँ... मैं दिन भर के कम से कम 4 बार झूठ बोलता हूं.. पूछने पर क्या कर रहे हो कहना होता है याद कर रहा हूँ कहता हूँ कुछ नहीं.. ठीक हैं जैसे सवाल पर भी यही होता है.. और ऐसे बहुत सवाल हैं जिनपर मैं न चाहते हुए भी झूठ बोलता हूँ। सच क्यूँ नहीं बोल पाता मैं..? मुझे कह देना चाहिए नहीं अच्छा लग रहा है कुछ तुम्हारे बिन..दिन नहीं बीतते. इतंजार भारी हो रहें हैं, मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ.. पर .. 

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हम वास्तविकता स्वीकार न कर पाने की वजह से दुखी रहते हैं। 

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मुझे इतनी बारीक बारीक बातों पर हर्ट क्यूँ हो जाता है ? मैं क्यूँ चाहता हूं कि कोई मुझे वैसे लगाव रखे जैसे मैं रखता हूँ.. क्या मैं स्वार्थी हो रहा हूँ.. ? लिखना भी तो स्वार्थी ही होना है न ? नहीं नहीं.. मुझे नहीं चाहिए किसी से कुछ.. स्मृति भी नहीं

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आज दिन  में सरसों के खेत के यूरिया डाल रहा था, सरसों फूलों से भरी हुई थी, अनगिन तितलियों का झुंड मुझसे गुजरता रहा, चेहरे पर जब जब तितली छूकर उड़ती लगता वो अपनी पतली उंगलियों से छूकर गयी.. 

घर पर गिलहरियों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर दिया है, छत वाले कमरे का दरवाजा खुला रह जाता है तो 8 10 लोग चली आती हैं नीचे और पूरे घर में मनमानी टहलती रहती हैं, जो मन खाती हैं छींटती हैं, दरवाजा बंद रहे तो दरवाजे को नाखून से खुरचती रहती हैं। 

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जब हम अकेले होते तो बस याद के दम पर जीते हैं.. 

जैसे अभी मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ। काश तुम होती और मुझे डायरी लिखने की फुरसत न मिलती। 

― 24 जनवरी 2025 / 9 बजे शाम 

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