भावना उस नदी का नाम है जिस पर बाँध सम्भव नहीं हो पाया है, जहाँ जबरन प्रयास हुआ भी वहाँ कुछ अच्छा नहीं हुआ। पानी को देर तक किसी पात्र में रखने पर वह सड़ जाता है, मगर अपनी सड़न के साथ भी बह निकलता है, दिन, महीना, साल लग सकता है मगर वह निकलता जरूर है। भावना पानी ही है, वो भावना सबसे सुंदर है जो लगातार अपनी गति के साथ बह रहा है, जब भावना दबाई जाती है तो वह कभी भी सकारात्मक रूप में दुबारा नहीं फूटती, नकारात्मक ही फूटती है। इस बात के कई जीते जागते उदाहरण इस देश की आबोहवा में मौजूद हैं जो समय समय रिसने लगते हैं फिर उनपर टांका लगाकर रोका जाता है, हर बार का दबाब उसे और घातक ही करता जा रहा है। यह एक दिन अपने विनाशकारी रूप में फूटेगा.. तब कुछ काम नहीं आएगा।
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क्या है कहना इस जमीन के साथ धोखेबाज़ी होगी कि मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता ?
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जब भी हम कहीं एक जगह होते हैं तो कई और जगहों पर नहीं हो पाते, दरअसल नहीं होना ही ईमानदारी है, लेकिन यही ईमानदारी कहीं अमानुषिकता है, कहीं छल, कहीं कुछ और..
फिर करें क्या ? क्या कहीं न होकर नहीं रहा जा सकता ? अजीब है! लेकिन हम जब कहीं नहीं होते तब भी कहीं होते हैं। हम होने के लिए बाध्य हैं। इन दिनों, दिन न जाने कैसे बीतता है। भीतर अजीब सी सनसनाहट बनी रहती है, ख़ुशी, दुःख, उत्साह कुछ महसूस नहीं होता बस निरीहता महसूस होती है, लगता है नियति के आगे सर रखकर पसर गया हूँ कि लो तुम जो ठीक समझो करो वैसे भी होना वही है जो तुम चाहोगे।
ये नियति की ऑफिस किधर पड़ती है मुझे अपना कागज़ निकालना है वहाँ से..
दिन बस दिन गिनते हुए बीतता है, मुझसे प्रतीक्षा नहीं हो पाती.. कोई कहता नहीं मुझे कि नहीं तुम करो ही मगर वह भीतर ख़ुद ब ख़ुद बन जाती है, जैसे कोई कहता नहीं कि मुझे प्यार करो वह खुद ब ख़ुद होता है, फिर वहीं लौटते हैं अगर प्रेम में पानी है उसकी नमी बनी हुई है तो वह दिखेगा ही.. अगर भीतर कुछ है तो वो बाहर दिखेगा ही उसे बनावटी ढंग से दिखाया नहीं जा सकता, दिखाया जाएगा तो उसमें वह कच्चापन नहीं होगा।
हमें किसी की याद क्यूँ आती है ? Why do we keep feeling someone around us? Why do we want that one person whom our heart desires to be always present even if he does not say anything? Is the intensity of the memory the same on both sides? When we tell someone that we are missing him, how does he feel?
मेरे वो सारे प्रश्न अनुत्तरित हैं जिनके जवाब मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ .. बस तुमसे..
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शाम बिताना कितना मुश्किल है, ख़ुद से आख़िर कितनी बात की जा सकती है, किसी से कितनी बार कहा जा सकता है कि याद आ रही है.. मुझे डर लगता है कहीं यह वाक्य अपने प्रभाव न खो दें..फिर क्या होगा ? कृष्ण बलदेव वैद कहीं कहते हैं ― 'शाम को किसी ना किसी तरह किसी न किसी की याद में गुजार देना चाहिए। अकेले ही।' वही करते गुजार देता हूँ, अकेला कितना होता हूँ नहीं जानता ।
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अब इतना लिख चुकने के बाद मन कर रहा है इसे इतना गोदु की कोई वाक़्य पढ़ने में न आए.. आख़िर क्या अर्थ है इस कागज़ घिसे का ? काश ! मुझे लिखना न आता होता
― 23 जनवरी 2025 / शाम 6 : 40
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