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बँटा हुआ है मेरा जीवन, बावन खण्डों में कटा हुआ

बिस्तर छोड़कर जब बाहर निकला तो चारों ओर गहरा धुन्ध छाया हुआ था, मन हुआ लौटकर फिर बिस्तर में ही पड़ा रहूँ। मगर चार नए जीवन की बालसुलभ शैतानी ने रोक लिया, तीन छोटे छोटे पिल्ले हैं उन्हें सुबह अधिक दुलार आता है, देखते ही आसपास पूँछ मटकाते हुए दौड़ते हैं, आगे के दोनों पाँव पटककर खेलते हैं, बिल्कुल छोटे टैडीबियर की तरह है गोल मटोल मुलायम से बिल्कुल, इनकी माँ ने इन्हें इस बार बहुत सम्भाल कर रखा था, दो महीने वो उस जगह से निकल नहीं पाए जहाँ उन्हें जन्म दिया था। अब वो निकलते हैं। टहलते हैं। मम्मी को देख लेते हैं तो जैसे खुशी से पागल हो जाते हैं उनके आसपास ऐसे उठते गिरते हैं की देखते बनता, उनकी साड़ी की कोर खींचते हैं, मनभर खेलते हैं, और एक हमारे हीरो हैं सोना के अकेले दीपक, बड़ी बड़ी आँख और कान लिए अपनी माँ का दूध पी लेने के बाद पूरे अहाते में ऐसे कुलांचे भरते हैं जैसे वो गाय के नहीं घोड़ी के बच्चे हों..

जानवरों के बच्चें हों आदमी के बच्चे हों या ख़ुद आदमी ही हों ये सुबह अधिक प्रेम से भरे होते हैं। इनकी स्फूर्ति नए ढंग से नए रंग रूप में दिखती है। मैं हर शाम जो होता हूँ, सुबह वह कभी नहीं होता। आँख तभी लगती है जब अपने को यह भरोसा देने में सफल हो जाता हूँ कि वह मेरे आसपास ही है। वॉलपेपर पर लगा उसका हाथ पकड़े उस महक को अपनी सांस में लौटा लाता हूँ जो कभी एक पल को मेरे पास था नितांत मेरा था, उस महक से मन स्थिर भी होता है रोमांचित भी, वहीं महक थकन में मखमली बिस्तर सी लगती है और देह में ऊर्जा होने पर वही महक अलग ढंग से महसूस होती है..देह की सभी नसों में एक अलग सा तनाव भर आता है, मन करता है बस वह देह वह महक वो स्पर्श मिल जाए, मन की आँखों से उसे छू लूँ देख लूँ फिर बाहर की आंख खोलूँ.. देह ऐसे ऐठती है जैसे सांप काटने पर आदमी ऐठता है। फोन ख़ोजता हूँ कि पास से न सही दूर से ही आवाज़ तो सुन लूँ.. पर यह आज़ादी भी कहाँ नसीब, थोड़ी देर फोन हाथ में लिए पड़ा रहता हूँ फिर उठ बैठता हूँ।

आज भी यही हुआ था.. मैं उससे बहुत कुछ कहते हुए एक संकोच से भर जाता हूँ, वह मुझे मेरी जननी की तरह लगती है, मुझे वह देंह, वह मन, वह आवाज़ सब बहुत प्रिय है, मगर उससे मेरे भीतर जो भाव उठता है वो मुझे स्थिर कर देता है, लगता है ऐसे ही अपने बचपन में मैं माँ से खेलता रहा होऊँगा। मेरा जो रूप उसके सामने है वह कोई और स्वीकार ही नहीं कर पाएगा, मगर मैं सच में वही हूँ जो उसके पास होने पर होता हूँ। 

पिछले कई वर्षों से यही होता आ रहा है.. एक टीस में एक कमी में जागता हूँ उसी टीस उसी अनुपस्थिति में सो जाता हूँ। यह कभी तो ख़त्म होगी ही..ईश्वर ने मन केवल मारने के लिए तो दिया नहीं होगा ? राम जाने कब तक यूँ ही ..ख़ैर .. 

इन चारों लोगों के खेल के बीच गाँव के तरफ से कुछ हल्ले की आवाज़ हुई तो थोड़ा आगे बढ़कर खड़ा हुआ, पता चला मुख्य सड़क से गांव में आने वाली सड़क बन रही है। जिसका कुछ हिस्सा एक लोग के गौशाला तक जा रहा है उसे मजिस्ट्रेट ने गिराने का आदेश दे दिया है, यह तो सब जानते हैं कि वह अत्यधिक जगह घेरकर बनाई गई है, अभी जब तक हमने अपने घर तक आने के लिए अपने खेत के बीच से राह नहीं बना ली थी घर तक कोई चारपहिया आना मुश्किल था, दोपहिया भी बड़ी सावधानी से मोड़कर आ सकता था, सड़क पर उस परिवार के जानवर खड़े बैठे रहते थे। हमारे गाँव में मेड काटने वालों की भरमार है। एक हमारे रक्तसम्बन्धी ही हैं, उनका जीवन यही करते बीता है, अपनी बुजुर्गियत में भी यही कर रहे हैं। गाँव की सड़क की दिक्कत की वजह से जब हमारे घर वालों ने चाहा की सड़क हम अपनी अलग ही बना लें तो उसमें भी नियत जमीन से तीन फिट जमीन कम दी गयी। उस समय उनका कहना यह था कि इसका क्या अर्थ है सब आ जाते हैं गाँव से अब उनके परिवार से भी सब यहीं से आते जाते हैं। मेड़ काटने की अगर किसी को ट्रेनिंग लेनी हो तो उनके साथ रह लें वो ऐसे ट्रेनिग देंगे की जमीन आगे सीधी रहेगी पीछे दस फिट अंदर घुस जाएगी। गाँव में भी अब कुछ गाँव सा नही बचा है, इसे अति रोमांटिसाइज करने की जरूरत नहीं है, सब लगभग एक दूसरे के रक्तसम्बन्धी ही हैं सब एक दूसरे को माँ बहन की गाली देते हैं, भाईचारे की भावना अब शहरी कवियों की कविताओं में ही है जो गाँव से दशकों पहले चले गए थे। गाँव के लोगों में से यह सब शहर चला गया, शहरीपन गाँव आ गया है।

खेतों की प्लाटिंग होने लगी है। बगल धार्मिक नगरी है, बड़े अमीर लोग आते हैं उन्हें गाँव देखना होता है तो गाँव के बीचों बीच की जमीन बिक रही हैं जो गवईपन समझा जाता था नए तरीके से लग रहा है, वही चूल्हा, हाथ की चक्की, ढेबरी, मटकी, बांस.. हद है। हमारे घर के सामने ही तीन करोड़ की जमीन बिकी है अभी सूचना है बड़ा होटल खुलेगा। मतलब गाँव को उस होटल की नींव में दबना होगा, दब ही जाएगा.. ये लोग आज भी नाली और सड़क के लिए लड़ रहे हैं इन्हें सड़ना ही पसंद है, और यहाँ के प्रधान, पुलिस अधिकारी, लेखपाल सब मिले रहते हैं। प्रधानमंत्री पेंशन अब खाते में आती है तब भी बैंक वालो से तय कर लिया है की पेंशन का 20 प्रतिशत रख लीजिए फिर पैसा दीजिए उनको कुछ भी समझा देते हैं। फिर वो पैसा ,5 , 5 प्रतिशत के अनुपात में बांटा जाता है। 

हद है! मैं भी क्यूँ यह सब लेकर बैठ गया हूँ कितनी बार इन्हें समझाया है ये मुझे ही मूर्ख समझते हैं। ये ऐसे ही लूटेंगे। गाँव का अंत अब करीब है इसका इलाज़ नहीं है, मुश्किल से 5 या 10 सालों में भारत से गाँव ख़त्म हो जाएगा, फिर गाँव बनाया जाएगा और पैसा लेकर बेचा जाएगा। 

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धूप तेज हो रही है, कल से सिर दर्द बहुत था तो रात माता से सर पर तेल लगवा लिया था, आज व्रत हूँ तो धूप में बैठा था, कुछ कहानियाँ पढ़ी। अज्ञेय की एक कहानी 'शरणदाता' पढ़ते हुए महसूस होता रहा कि यह कितना कटु सत्य है। आज तो एक जाति विशेष को बुरा कहने वाली कहानी साबित कर दी जाती। वर्तमान में सभी लेखक संघो ने लेखकों से उनकी एक आँख छीन ली है उन्हें बस एक पक्ष दिखता है और सभी पर वो मौन हो जाते हैं। अगर कोई उस पक्ष पर बोलता है तो उसे संघी घोषित कर देते हैं इतनी निकृष्ट बुद्धि इससे पहले कभी नहीं रही होगी इनकी, ये सारे लोग राजनीतिक गुलाम है इनसे समाज के सच की कल्पना करना मूर्खता ही है । 

दिन ऊबते हुए, कुर्सी छाँव से धूप में करते, बहुत कुछ ऐसा सोचते महसूस करते बीत गया जिसे कहकर मैं बस ग़लत होऊँगा। ख़ैर...मेरा जन्म ही शायद इसीलिए हुआ है। मैं उन तमाम बातों की चिंताओं से घिरा रहता हूँ जिसे आम जन में चिंता का कारण नहीं माना जाता। घर पर बस मैं और मां हैं दिन भर में किसी से कुछ बोलने को मन तरस जाता है, इतनी ख़ामोशी झेल लिया हूँ कि अब कोई आसपास होता है या बोलता भी है तो सूझता ही नहीं की क्या बोलूं जबकि जवाब हर बात का दे रहा होता हूँ , पर वह बाहर सुनाई नहीं देता। 

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एक आवाज़ में इतनी ताकत क्यूँ होती है कि वो अपनी एक पुकार से हमारे भीतर की सारी नाराज़गी सोख लेता है ? हम क्यूँ उससे मन का दुःख नहीं कह पाते जिससे मन सबसे गहरे जुड़ा होता है ? हम क्यूँ उसी तरह हो जाते हैं जिस तरह वो सोचता है ? सब ठीक है जैसे बाजारू वाक्य क्यूँ घुस गए हमारे सम्बन्धों में... राजकमल चौधरी की ओट लेकर कहूँ तो ' बँटा हुआ है मेरा जीवन, बावन खण्डों में कटा हुआ' मैं अब जीवन के कई खण्ड गिन पा रहा हूँ। 

जीवन यही है शायद ! 

― 21 जनवरी 2025 / शाम 6:40 

टिप्पणियाँ

  1. लिखते रहिए। पढ़ा जा रहा है।

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  2. अपका लिखा पढ़ना ऐसा है जैसे सांस रोक कर गले लगाना। कोई चिट्ठी, पढ़ना सुखद है।

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