मन लगातार बस एक तरह का रहता है। भीतर यह चाह बनी रहती है कि कैसे करके वहाँ पहुँच जाऊँ जहाँ आसपास सब कुछ अपना सा है। संयुक्त परिवार भी रहा तो बहुत शालीनता और ज्यादा खामोशी कम वाचालता के साथ रहा। हम बचपन से जैसे जैसे बड़े हुए लोग अपनी रोजी रोटी के लिए जहाँ गए वहीं बसते गए। बाबा की मृत्यु हुई, परिवार पूर्णतया बिखरता गया। यही मौसम था यही समय मैं भूल नहीं रहा हूँ तो यही तारीख़ भी, हमको वो दिन एक एक पल याद है। हम सब जब श्मशान से लौटे तो ननिहाल से खाना आया था, हम सब भाई बहनों ने वही खाया था। पिताजी लोग तो वैसे ही रहे थे। अगले दिन क्रिया शुरू होने के पश्चात शाम को कुछ खाया था शायद आलू या गंजी उबाली गयी थी। सन 2009 की बात है, मकर संक्रांति पड़ी थी अगले दिन.. महीने दो महीने लोगों का आवागमन रहा फिर घर पर कुल 5 लोग बचे, मैं दोनों बहनें माँ और दादी...
हम सब में कोई बहुत बोलने वाला नहीं है। सब अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त, बात होती भी तो लो टोन में वो आवाज़ कान को दुःख देने वाली नहीं होती थी। परिवार में बचपन से बहुत संस्कारित माहौल था। 5 बजे सुबह उठना, सबके पैर छुना, वंदना करना, खेत जाकर काम करना, फिर स्कूल.. हमको याद नहीं अभी तक कि मैं कभी अपने बड़ों के खड़े रहने पर बैठा होऊं, या खेत में हूँ तो मेरे रहते बड़े भईया को कुदाल पकड़नी पड़ी हो। अपनी उम्र से बड़ी चीजें भी इसलिए कर लेते थे कि भईया को न करना पड़े। ख़ैर भईया लोग सब कभी कभार ही आते थे, गाँव हम राहुल भईया और अंशुमान भईया ही रहते थे। वो भी मेरे आठवीं तक पहुँचते पहुँचते बाहर पढ़ने चले गए, फिर घर, गांव देहात, मरना जीना शादी विवाह सब के लिए मैं ही था।
बचपन में जो बाबा का अनुशासन था वो अब तक भीतर बना हुआ है, कभी कभी इसी प्रभाव में कई बात बोल जाता हूँ, कहीं जाता हूँ जब छोटों में वो नहीं देखता तो, अब तो लोग नमस्ते प्रणाम भी नहीं करते, जाते समय खड़े तक नहीं होते, पहले हम सब कोई आता तो उसकी साइकिल पकड़े दूर तक जाते फिर लौटते थे, हमारे यहाँ हल जोतने आने वाला बाबा तक को रोज सुबह कहते .. ' जयराम काका' वो पलटकर कहते 'काहे पाप लादत हया बच्चा हमरे गोड धरत हई' ज़ाहिर है जातिगत डर था एक जो बेवजह था । उनको लगता रहा होगा ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेकर मैं बड़ा हो गया हूँ वो छोटे, ख़ैर बाबा यह सब कभी अपनाए नहीं। हम लोगे कभी उनका नाम भी ले लेते तो खूब डाँट पड़ती कि बाबा हैं तुम्हारे कान पकड़ो माफ़ी मांगो.. यह धीरे धीरे स्वभाव हो गया अब तो किसी से भी मिलता हूँ हाथ जुड़ जाता है।
हद है, मैं भी कहाँ चला आया.. मैं बाबा के साथ सबसे कम रहा पर आज तक वो मेरी हर चार बात के बाद आ ही जाते हैं। दादी कहती थी, 'तोहार बोली, नाक और पैर सब ओनही नाय बा..' नीचे जो पुराना बाथरूम बना था, उसकी फर्श में बाबा की उंगली छपी थी वो कच्चे फर्श में चल दिये थे। एक बार तो दादी हमारा पैर वहाँ रखकर नापी भी थी... उसी साल वो हमको जूता खरीदने के लिए 150 रुपया दे रहीं थीं।
दादी का देहांत नवंबर में हुआ था जब मैं इंटरमीडिएट में था। उसके बाद गाँव में हम चार लोग बचे पापा महीने में चार दिन गांव रहते हैं या कोई छुट्टी हुई तो.. वो भी बहुत कम बोलते हैं, ज्यादा देर बात कर ले कोई तो सर खुजलाने लगते हैं। हम सब धीरे धीरे कम आवाज़ के आदी हो गए हैं। ज्यादा आवाज़ या कर्कश आवाज़ में घुटन होती है, सर पकड़ लेता है फिर उल्टी होकर ही ठीक होता है, आज जाम में फंसा था लौटा तो यही सब हुआ।
*********
मैं भी कितने बेतरतीब हूँ चलता कहीं से हूँ चला कहीं जाता हूँ, माँ बचपन से ही कहती थी मुझे ' बताउबा पुरुब जाबा पच्छु..'
**********
हम बड़े होने पर भी वही रहते हैं जो बचपन में सीखते देखते हैं बस उम्र का फायदा लेते हैं औऱ दिमाग का उपयोग करने लगते हैं। फायदा और घाटा देखकर बोलने लगते हैं।
*********
कुछ दिन अपनी विशेष स्मृति के साथ हमारे अवचेतन मन में बैठ जाते हैं, उन दिनों को हम नहीं सोचते तब भी हम वही सोचते हैं।
********
देंह में बहुत थकान हो तब भी हम देंह चाहते हैं जिसपर हम साँप की तरह लोट सकें।देह की थकन देह से ही मिटती है। बचपन में मां के पेट में घुस जाता था, पापा आते थे तो सुबह अपना बिस्तर छोड़कर उनके पास जाकर लिपटा रहता, अब ...
हद है मैं प्रेम भी छूकर ही ज़ाहिर कर पाता हूँ, और अब छूने को मेरे पास कोई नहीं..
********
पुरूष जैसे जैसे बड़े होते हैं वो अकेले होते जाते हैं।
******
दिन ठीक ठीक गुजरा दिन की ही तरह.. बारिश होती रही, मन सूखा रहा। मन का पानी दूर शहर में बैठा है।
― आशुतोष प्रसिद्ध
12 जनवरी 2025 शाम 6:40
बहुत बेहतरीन लिखते हो तुम 👌👌
जवाब देंहटाएं