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फिर वही रात है .. रात है ख़्वाब सी..

ऊब जैसा कुछ कुछ भीतर होता रहा। हावी नहीं हुआ। अकेलापन नहीं महसूस हुआ। हुआ भी तो एक उम्मीद ने उस पर काबू रखा। अपने को अपने वश में करके जीने का जतन करता रहा। आधा सफल हुआ। रात बीतते बीतते मन भर रोया। हल्का हुआ। तो ख़्याल आया एक और साल अब मुँह बाए सामने खड़ा है यह कहने को कि अभी तक कुछ नहीं कर पाए ? हद है तुम नकारा ही रहे ! 

अब मन को दबाना सीख गया हूँ। दबाया और कुछ घड़ी निराला को पढ़ता रहा। मैं निराला और शमशेर की शाब्दिक गोंद में जाकर ही मानसिक मार से बच लेता हूँ। 


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कल रात नितीश भईया से बात हो रही थी, उन्होंने कई जरूरी मुद्दों पर बात की। कुछ ऐसे भी जिनपर खुलकर बात करना क्या सोचने तक पर पाबंदी है। यौन इच्छाओं का दबाव, स्पेस की कमी, लड़कियों के मन में जबरन का भरा हुआ सुचिता का विचार, जबकि वह हमारी मूल प्रकृति है, हम अपनी प्रकृति से हटते जा रहें हैं इसीलिए मनुष्य होने से भी चूकते जा रहें हैं। सेक्स बहुत सामान्य सी आवश्यकता है जिसकी पूर्ति भर की छूट, उतना स्पेस, हमें बनना होगा। सम्भवतः हमारी संताने इस मामले के अच्छा समाज पाएंगी, हम उन्हें खुलकर जीते देखना चाहते हैं। मन मारते, सबके सामने बेहद शालीन बनते और अकेले में पोर्न फिल्मों से ख़ुद को संतुष्ट करते बच्चे नहीं, अपना साथी चुनने और अपना जीवन अपने ढंग से जीने को आज़ाद बच्चे, जो अपनी सफलता और असफलता ख़ुद तय करें किसी के कहे अनुसार नहीं।


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दिन भर वही रटा रटाया वाक्य 'आपको भी' कहते हुए बीता। उन लोगों ने भी नववर्ष की शुभकामना भेजी जिन्होंने बीते वर्ष को नर्क बनाने में कोई कसर न छोड़ी थी। 

अकेले आप कितना उत्साहित हो सकते हैं ? 

रात 3 बजे तक पटाखे फटते रहे नींद नहीं आई..

अनन्तः उत्साह का पराभव हुआ। सब शांत हुआ। उत्साह हीन होने के बाद ही व्यक्ति का मन द्वंदात्मक होकर सोच पाता है, तभी हमें आभास होता है वह जो किया गया उसका कोई अर्थ नहीं है, न उसकी कोई विशेष उपयोगिता है। सब कुछ वैसे का वैसे है, वही लोग, वही चिंताएं, वही बचना है वही जीना भी, दुनिया भी वैसी ही है, अब तो रोज नए नए त्यौहार पैदा किए जा रहें हैं ताकि बाजार का भला हो सके। हो रहा है। 

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दिन, दिन जैसा ही बीता। आसपास जब उत्सव सा माहौल हो तो अपनों की बड़ी याद आती है। भले ही हम साथ हों तो कुछ नहीं करें मगर साथ होने की इच्छा से जो टीस उठती है वो न हमें अपने साथ रहने देती है और न उनके ही जिनके हम हैं। हम होते कहीं हैं रहते कहीं हैं। 

कुछ घड़ी नदी किनारे बैठा रहा, लोगों के चेहरे देखता रहा। मंदिर नहीं गया। कुछ घड़ी स्टेशन पर बैठा था , फिर लौट आया। ज्ञानरंजन की चार कहानियां पढ़ी। उनकी भाषा और बिम्ब को बात बनाने की कला से मन कुछ वाक्यों में अटक गया। 

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लिखना भी अजीब सा नशा है। सबके पास अपनी अपनी तरह का नशा है, शब्द सबके पास वही हैं , भाव भी सबके जीवन में वही हैं, मगर उसे कहकर और नए ढंग से कहकर जो संतुष्टि मिलती है वो अदभुत है। अब तक कितनी डायरी भर गयीं, फोन का नोटपैड भरा है, इस वर्ष तो दिल्ली ने भी अप्रत्याशित सम्मान दिया, कवि कहकर एक सूची में जगह दी, कुछ पत्र पत्रिकाओं में लिखा भी,  मगर भीतर से खाली नहीं महसूस होता। न जाने कौन भेज रहा है इतने शब्द, न जाने क्या उखाड़ ले रहा हूँ मैं लिखकर.. न जाने कब मैं आखिरी शब्द लिखूंगा और महसूस करूँगा वह असीम शांति जो महसूसना चाहता हूं। 

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ख़ैर ...


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― आशुतोष प्रसिद्ध 

1 जनवरी 2025 / 8:15 शाम 

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