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हैं न होने के बराबर मगर हैं हम लोग..

कुछ भी पूरा नहीं है।अधूरा भी नहीं है। क्या है पता नहीं। हूँ भी या नहीं, नहीं पता ! कहीं कहीं तो होना शब्द शर्मिंदा हो जाता होगा मेरे साथ, जब कहता होऊँगा कि ' मैं हूँ यहाँ देख लूँगा ' यह कहने के तुरंत बाद ही मन पूछता है, खुद को तो आजतक देख नहीं पाए और सब कैसे देख लोगे? मैं भीतर की बातें भीतर ही दबा लेता हूँ। हँसता हूँ। सबसे पूछता रहता हूँ कोई दिक्कत तो नहीं है ? कुछ चाय नाश्ता लेंगे ? बैठने में असुविधा तो नहीं है ? पूछता रहता हूँ चलता रहता हूँ। भीतर मैं कलझता रहता हूँ, भीतर का सब देखने का अधिकार उसी का है जिसके लिए मेरी देह का स्वेद और वीर्य है। जिसके लिए मैं बाहर भीतर एक सा हूँ। 

दिन भर दौड़ता भागता रहा। एक पैर जमीन पर रहा एक गाड़ी पर..  अन्ततः आप कितना भी बचें वो पकड़ ही लेते हैं जो आप बिगड़ते नहीं देख पाते। जिम्मेदारी स्वभावगत होती है। बताकर काम करवाया जाता है। सोचकर, देखकर और छोटी बड़ी आवश्यकताओं का अवलोकन कर उसे सही करना जिम्मेदारी भरे स्वभाव से होता है। मैं घर वालों और रिश्तेदारों की उम्मीदों पर इतना खरा उतर जाता हूँ कि मुझे सब पकड़ाकर वो कहीं आराम से बैठ जातें हैं। बिगड़ते न देख पाने के स्वभाव से मेरे भीतर बहुत कुछ बिगड़ता रहता है। 

पिछले कई सालों से मैं घर आकर भी घर जैसा महसूस नहीं कर पाता, तभी मैं कहता हूँ यह मेरा घर नहीं।  अकेले रहने के दौरान तो बिना कुछ खाये भी सो जाता हूँ। यहाँ वह भी नहीं होता। ख़ुद के लिए नहीं बनाऊंगा, कुत्तों का क्या होगा ? चिड़िया और गिलहरी रानी क्या खाएंगी सुबह ? सोना जो 9 बजे रात तक इस आस में बैठती नहीं हैं कि अभी आ रहा होगा खाने से पहले निकाला गया अग्रासन, मेरी थकन से कई पेट भूखे रहें इससे बेहतर थोड़ा और श्रम कर लेता हूँ। 

आज दिन में मैं नाना के घर से दोपहर में लौटकर आया पूजन के बाद फिर गया शाम को यह लगातार 4 बार हुआ। पूजन के दौरान एक विधि होती है जिसमें मुख्य यजमान सिर पर श्रीमद्भागवत महापुराण लेकर घर के कोने कोने में जाता है। वहाँ अक्षत और फूल अर्पित करता है। और सब पितरों को मुक्ति पाने के लिए पुकारता हुआ, व्यास पीठ जाता है, फिर वहां उसे रखता है विधिवत जयकारों और घण्टे और शंख की ध्वनि में.. नाना सिर पर पोथी उठाए हुए चल रहे थे। मैं उनके पीछे पीछे पैसे की बैग लेकर चल रहा था। जहाँ संकल्प और अन्य चीजों की जरूरत पड़ती तो मैं देता। दलान से जब वो बाहर निकलने लगे तो उनके चेहरे के हावभाव बदलने लगे, बस क्षण भर बाद आँख से आँसू फूट पड़े, मैंने पीठ पर हाथ फेरा, कहा, कुछ सोचिए न नाना, सब एकदम अच्छे से पार होगा, मैं हूँ न.. वो थोड़ा सम्भलकर बोले;  'उ तो हमय पता बा, तू हया तव कुछ बिगड़ै न पाए, बस हमरे मन मा आए की अइसे कबहुँ तू औ हमार नतोहू हमरे दूइनो परानी का यह संसार सागर से पार लगाउबा, सबसे बड़का नाती तउ तुहि हया हमार'  उहव आई जात, वोका देख लीत कुछ लय दय दित, तब भगवान लाई जाते तव ठीक रहत। फिर रोने लगे, इस बार के रोने के गर्व जैसा था कुछ, चेहरे पर आश्वस्ति की हँसी थी और आँख में आसूँ भरे हुए। मैं वहाँ से हट गया, उन्हें बैठने को बोलकर...

कुछ घण्टे वहीं रहा जब सब सही से चलने लगा तो घर की तरफ चला, भीतर अजीब सी याद दौड़ी.. गले और सीने के बीच जैसे कुछ अटक गया हो ऐसा दर्द होता रहा, यह कई घण्टों हुआ..जब तक कि.. ख़ैर। 

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कथा आज शुरू हो गई। सब परिवार जुटा हुआ है। मम्मी तुम्हारी दी हुई शॉल लेकर चलती रहती हैं, सब छोटी बहने भाई तुम्हें याद करते हैं, पूनम मौसी हमसे कह रही थीं हमरे दीदी पहली बार हमका कुछ देय से मना करे हईं, हम कहें पापा की चिट्ठी भी तो नहीं देती थी, तो बोली अरे वो तो उनके आदमी की बात थी, हम 45 साल होई गय दीदी हमार कबहुँ कुछ मना नाय करी, जौन साड़ी जौन गहना कह दी दीदी रे नीक लागत बा कहय लाई ले.. लेकिन आज हम कहे दीदी इहे शलिया दई दे बड़ी सुंदर बा.. कहीं एका न माँगा अउर कुछु माँगी लिया' हम कहे तोहरे दोइनो बहिन कय मामला हम नाय जानित... और हट गया वहाँ से। मम्मी पांचों भाई बहन इकट्ठा हैं, ख़ूब खुशहाल हैं सब। मैं मम्मी को वहाँ मम्मी की तरह नहीं एक लड़की की तरह देखता हूँ। आज पापा बोले लिए आना शाम को पर मैं जबरन नहीं लाया.. मुझे तो अकेले बनाने खाने रहने की आदत है वो ख़ुश हैं तो रह लें सबके साथ। 

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तुम्हें देखने और सब दिखा देने की तीव्र इच्छा हुई थी। फोन सोचा करूँ। फिर हिम्मत नहीं हुई। डर यह भी था कि नहीं उठा तो मन खराब होगा। बेहतर है उम्मीद बनी रहे, कही  तुम भी पढ़ लिख रही होगी। तुम्हारे हिस्से के संघर्ष में तो मैं कुछ नहीं कर पा रहा... इस बार तो स्टेशन भी नही दिखूंगा की उतरते बैग ही पकड़ लूँ।यही सब सोचकर रह गया। कर भी देता तो क्या बताता.. भावनाएं बताने से कहाँ वैसे पहुँच पातीं हैं, वह कहीं न कहीं विकृत हो ही जाती हैं। आज सोच रहा था अगर मैं न कहूँ की 'याद आ रही है' तो क्या तुम भी नहीं कहोगी कुछ ? फिर यह भी सोचा न कहने से भावनाओं का आना थोड़ी बन्द होगा 

बस मैं भावनात्मक धोखे की ग्लानि से भरा रहूँगा। मगर सोच रहा हूँ कुछ दिन ग्लानि भरकर देखता हूँ... 

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आज नींद आई तो मैं सोऊँगा। मुझे मरने की तरह सोने की जरूरत है। 

― 20 फरवरी 2025 / 10 बजे शाम 

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