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क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से मौत का भी इरादा बदल जाएगा

बहुत कुछ सोच विचार और जी लेने के बाद अंततः जब अपने साथ बैठता हूँ आँख बंद करता हूँ तो खुद से कहता हूँ ;  बक रहा हूँ जुनू में क्या क्या कुछ/ कुछ न समझे खुदा करे कोई  

कोई यानि बाहरी कोई, वो एक समझे जिससे बकता हूँ, उसके समझने में बचे रहना महसूस होता है। मेरा ध्यान और योग सब लिखने से ही होता है, मैं सबसे ज्यादा बुरी मानसिक प्रताड़ना से तब गुजरता हूँ ,जब मैं लिख नहीं पाता और उससे बात नहीं कर पाता, बात करने जैसी बात, हाल चाल लेने वाली बात नहीं। 

सुबह सुबह एक सवाल से जुझा कुल्ला भी बाद में किया जबसे उठा, वो किया जो नित करता हूँ, उसकी तस्वीर देखी, आवाज़ सुनी, और लग गया जमीन( फर्श ) पर बैठकर उन चीज़ों को खोजने और लिखने में जो करना था। किया। बहुत संतुष्ट नहीं हूँ। मगर ठीक है। यह सब करने के बाद.. देर तक अकेले अपना हाथ पाँव समेटे बैठा रहा, सोचता रहा मैं कितना दोहरा चरित्र व्यक्ति हूँ , जिस मुद्दे पर सारी दुनिया से बात कर रहा हूँ, उससे अपने ही सबसे करीबी साथी से बात नहीं करता, मैं तो करना चाहता हूँ, वह नहीं करती ? वही दबाव है जो हम सब पर होता है। मैंने उससे कभी यह तक नहीं पूछा कि मुझे छूने या मेरे छूने के बाद कैसा महसूस हुआ, सेक्स और साथ के आनंद पर बात करना तो दूर की कौड़ी है। न जाने क्यूँ मैं उससे साथी से अधिक माँ सा प्रेम करता हूँ, तमाम इच्छाओं के बाद कहना नहीं हो पाता, यह कभी तो ठीक होगा ही.. मैं अपनी त्वचा पर उसके स्पर्श की झनझनाहट महसूस करना चाहता हूं उसकी इच्छा और बिना नैतिक और सामाजिक दवाब से पैदा हुई इच्छा का..

क्या तुम भी सोचती हो या तुमको मैं राक्षस ही लगता हूँ ? 

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घर से आने के बाद से आज बाहर निकला था, यूनिवर्सिटी तक गया, कुछ प्रोफेसर लोगों से मिला। मुझसे झूठी और औपचारिक बात नहीं हो पाती। 

थोड़ी देर बाद ही वहाँ से उस गली तक चला गया, जहाँ कभी पहुँच कर कह देता है 'नीचे आओ जरा ' और तुम दो मिनट कहकर दस मिनट में धीरे धीरे शर्माते हुए आती थी ' शहर में तुम बिन और हैं ही नहीं कुछ।  कल घर जाना है। होती तो तुम्हारा हाथ तो छू पाता, तुम्हारी आंख में देखता कि मेरे जाने का दुःख होता है कहीं.. उन उन जगहों पर खड़ा रहा जहाँ खड़ा होता था। उस दुकान के सामने भी जहाँ से लड्डू भेजती थी तुम मुझे.. मुझे अब लड्डू अच्छे ही नहीं लगते। नहीं खाता। तुम्हारे हाथ का साबूदाना खाना है.. जैसे बनाने के बाद तुम जरूर कहती जल्दी जल्दी में उतना अच्छा बन नहीं पाया, और मैं नहीं कह पाता, अपना घर होगा तो आराम से बनना... उस हाथ सा स्वाद कहीं सम्भव ही नहीं। 

सारा शहर जाम से भरा हुआ है। सांस लेना दुबर है, वाहनों से बेहतर है पैदल चलो। जाने कब ख़त्म होगा ये...

एक पुराना लेख छपा। उसे पढ़ा अपने पुराने दिनों को याद करता रहा। लोगो के कपड़े धूलने उन्हें बनाकर खिलाने और बच्चे से पालने के दिन याद आए और वो भी सब जो आज वो बड़े होकर कर रहें हैं। ख़ैर सब ठीक है। मैं भी गलत होंउँगा कहीं तो जरूर । अपनी नज़र में न सही उनकी नज़र में तो कुछ गलत होंउँगा ही। ठीक है। 

यूनिवर्सिटी के भीतर एक घाव  दिख गया। टीका लगाए हुए। हँसते हुए। मन अजीब हुआ फिर लगा ठीक है ये अपनी मौत मरेंगे। चंदन और महादेव पाप नहीं धोते। 

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मेरा मन करता है मैं दुनिया के कलाकारों की डायरी और पत्रों का संग्रह कर लूं। हमारे घर में इतनी किताबें हों कि अगर हमारे बच्चे कुछ न करें तो किताब बेचकर कुछ साल जी लें। एक ऐसा कमरा हो जिसमें बस एक कुर्सी हो चौड़ी कुर्सी जिसपर हम साथ बैठकर पढ़ें अपने साथ को जिए परिवारिक उलझनों को सुलझाएं। इसमें ज्यादा खर्च नहीं लगेगा मैं बना लूँगा। उसे उपहार दूँगा। 

कल रात से एक ग़ज़ल लगातार सुन रहा हूँ जाने क्यूँ जबकि इसे पहले भी सुनता रहा हूँ.. शायद नया कुछ खोजने के लिए। 

अनवर मिर्जापुरी की ग़ज़ल, जगजीत सिंह की आवाज़ में है..  ' रूख़ से परदा हटा दे जरा साकिया ' अदभुत शांति है। 


– 15 फरवरी 2025 / 9:15 शाम

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