सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भावनाएं गूँगी नहीं होतीं !

समझने समझाने और तमाम ज्ञान भरी दुनियावी औपचारिक बातों से परे जो मूलभूत बात है वह है साथ, मुझसे नहीं झेला जाता अकेले यह जीवन.. कितनी देर बिना अपने सबसे प्रिय की आवाज़ रहा जा सकता है, कुछ मिनट कुछ घण्टों बस.. यह हद है। अपनी पीड़ा अपनी पीड़ा लगती ही नहीं जब वो परेशान हो.. अपना दुःख न्यून हो जाता है। सब दे देने, सब सौंप देने की इच्छा होती है। कितना भी समर्पित कर दें खुद को,लगते रहता है कि थोड़ा और..ऐसा क्या करें कि उस में समा जाएं। आह ! प्रेम... फिर भीतर सवाल भी उपजता है कि मेरा है क्या ? मैं भी तो अपना नहीं हूं उसका हूँ.. खुद को तो कब का उसके हवाले कर चुका हूँ। फिर किस अधिकार से अपने को देने का दावा कर रहा हूँ। अपने को तो मैं दे चुका हूं तुमको, तुम क्यूँ नहीं रखती मुझे अपने पास.. क्या तुम्हारे पास रहने के लिए तुम्हारे कोख से जन्म लेना ही अनिवार्य शर्त है। अगर हो सके तो मुझे अभी भर लो अपने मन के गर्भ में और दे दो जन्म जिससे तुमसे रहा न जाए मुझसे दूर.. 

यह साल भी यूँ ही बीतेगा क्या ? तमाम इच्छाओं पर अंकुश सहते, मन के शब्दों पर नहीं की छपकी पड़ते। 

अपनो से दूर रहकर अपने को स्थिर कैसे रखा जाता है? 

इतने मजबूत लोग कैसे बनते हैं जिनको याद में रोना नहीं आता.? 

तुम्हारे बिना यह शहर काटने दौड़ता है, गाड़ी पर धूल पड़ी है, जो जैसा था सब वैसे पड़ा है, पापा का स्वास्थ्य भी नहीं सुधार पा रहा.. बात ही कर सकता हूँ, अधिकार जताने से डर लगता है, उम्मीद थी मिलूँगा तो सब समझा दूँगा देख छू लूँगा.. पर वो आदमी भी हमारा जीवन जी रहा है, या मैं उसका .. पता नहीं। एक उम्मीद यहां तक खींच लाती है। वरना मैं तुम्हारे बिना यहाँ मुँह न करूँ। 

अपने स्वभाव पर बड़ी शर्मिंदगी होती है। 

मैं अपनी बनाई योजनाओं को फलीभूत नहीं कर पाता। जाने कौन सी गलती है। महादेव क्षमा कर दो.. या बुला लो अपने पास ही। 

― 12 फरवरी 2025 / 10 : 40 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...