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जनवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Is God Dead?

तमाम प्रश्न हताशा से गहरे हलक से हाँफ रहें हैं, उनका उत्तर कहीं दबा दिया है, वह निकलेगा, मगर कब ? यह पता नहीं। मगर निकलेगा जरूर, उत्तर छिपते नहीं हैं, उन्हें दबाया जा सकता है, दबी हुई चीजें जब फूटती हैं तो पूरे जोर से फूटती हैं फिर उन्हें कोई नहीं रोक पाता।  ************* जीवन अलग अलग भावनाओं का कोलाज है, लेकिन क्या यह तय नहीं की कोलाज में कितनी भावनाएं हो सकतीं हैं ? हम ऐसा क्यूँ नहीं कर सकते कि हम अपने मन अनुरूप भावनाएं रखें और सबको निकाल दें। काश ऐसा हो पाता तो मैं अपने को झाड़ देता जैसे कपड़े धुलने के बाद धूप में डालने से पहले झाड़े जाते हैं। कुछ तो भार कम होता, कुछ ही सुखाना पड़ता सूर्य को।  ************* हर कोई अपनी अपनी मूल पहचान खो रहा है, ईश्वर खो रहें हैं ईश्वरत्व, और मनुष्य अपना मनुषत्व  ************* यह वर्ष निराशाओं से शुरू हुआ था, पिछले वर्ष और उसके पिछले वर्ष की इच्छाओं को इस वर्ष भी उम्मीद के सूत से बांधे आया था कि यह वर्ष अपना होगा वह करूँगा जो चाहता हूं, उसके साथ रहूँगा जिसके साथ रहना चाहता हूँ, पर कुछ नहीं हो सकता दिख रहा है...  ************** आ गयी फर...

मन विषयक

एक अजीब सी कोफ़्त एक चिढ़न थकान सा कुछ मन में हावी है, समझ नहीं आ रहा है क्या करूँ ? कैसे मन को समझाऊँ ? जहाँ हूँ वहाँ हूँ नहीं, जहाँ नहीं हूँ वहां होने की इच्छा यहाँ होने नहीं दे रही है, भीतर कुछ कचोट रहा है। मन ...  मौत मजाक बनकर रह गयी है, लोग धर्मांध हो गए हैं, उन्हें दिख रहा है आगे कुआं है फिर भी कूदे जा रहे हैं। कुछ बोलो तो गालियाँ सुनो.. क्या किया जाए ? क्या मौन रहा जा सकता है ? बाहर से तो रहा भी जा सकता है, भीतर ? कैसे ?  ऐसे समय में सोना गुनाह है, नींद तो यूँ भी नहीं आनी है।  ― 30 जनवरी 2025 / 8:30 शाम 

आँसुओं की आवाज़

रौशनी की खूब व्यवस्था है, विकल्प ही विकल्प है, सूरज से ही काम नहीं चलाना है फिर भी अंधकार का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। इतनी किताबें, इतने नीतिपरक वचन, इतनी महनीय आत्माओं के संदेश उनका बलिदान आस्था के नाम पर ठगे जा रहे लोगों में रौशनी नहीं कर पा रहीं हैं। शासन प्रशासन या और सारे पुलिस बल भी लोगों की मदद बिना बेकार हैं। और लोग हैं कि उन्हें कुछ दिखता ही नहीं, उन्हें मरने की उत्सुकता है, आस्था का अहंकार है, सनातनी होने दिखावा करना है। कर्म लगभग के अच्छे नहीं हैं, हर दूसरा आदमी तीसरे को नोच लेना चाह रहा है लेकिन सबको लगता है यह सब पाप गन्दी मानसिकता गंगा धो देगी। वो कभी नहीं धोएगी। ऐसी आस्था, आस्था कम मूर्खता ज्यादा है जो लोगो हो तर्कहीन कर दे।  सोचने विचारने की क्षमता सोख ले। ऐसे मति वालों के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है, उनके लिए कुछ भी कर लो सब बेकार है, संत समाज भ्रष्टों से भर गया, वह अनर्गल प्रलाप करता है। अशिक्षित लोगों में रोष पैदा करता है, जिसके लिए करना चाहिए उसके लिए नहीं करता कुछ, वह चाहता है कि लोग उनके चरण वंदन करें, मूल बात से दूर रहें।  सरकार तो हमेशा से ऐसे मामलों ...

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता...

कितना कह लूँ कितना लिख लूँ कि कहने और लिखने की जरूरत ही ख़त्म हो जाए, मामला बस समझने का बचे, क्या यह सम्भव है ? काश यह सम्भव होता, अगर यह मेरे प्राण की आहुति से भी हो पाता तो मैं तैयार हो जाऊँ बस कैसे भी यह कहने और लिखने की जरूरत खत्म हो जाए, प्रेम को भिखारी की तरह न माँगना पड़े। माँग कर मिली हुई चीजों में सुख भी नहीं होता, हम उसमें सहृदयता खोजते हैं, वह दृष्टि खोजते हैं, वह भाव खोजते हैं जो एक मन ख़ोजता है.. मगर वह नहीं मिलती। मिलेगी भी नहीं। सुख सदा स्वस्फूर्त चीजों से ही मिलता है वो भावनाएं हों या सामान.. दवाब में पका फल सुंदर दिखता है स्वादिष्ट नहीं होता। हम अभी अपने अपने स्वभाव अनुसार अपने अपने वातावरण में पक रहें हैं जिससे हमारा स्वाद बना रहे।  ********** फरवरी आने को है..बस दो दिन और..यह पूरा महीना स्मृति का महीना है, जीवन का महीना है। मन इसी महीने की किसी तारीख को अपने स्थायी पते तक पहुँचा था। सम्भवतः इस महीने अकेले रहना पड़े। इन दिनों भी तो अकेले ही हूँ, मगर हम प्रेम में अकेले कब होते हैं ? अकेले होते हुए भी दो का अकेलापन होता है, श्रीकांत वर्मा की कविता पंक्ति को ...

अ-धार्मिक लोगों की धार्मिक भीड़

हम अपना हृदय शब्दों के सहयोग से दर्पण की तरह खोलकर रख देते हैं, वो हूबहू तो नहीं मगर मन के आसपास तक पहुँचता हुआ लगता है, जिससे कहना है उसे कह देते हैं, फिर जब वो उन पीड़ाओं से दुःखी हो उठता है तो भीतर से ग्लानि पनपती है, अपने ही ऊपर क्रोध फूटता है, मन कितना अजीब होता है न ? वह चाहता है कि उसका प्रिय यह भी जाने उसके पीछे छूटा व्यक्ति उसे कैसे याद कर रहा है उसकी अनुपस्थिति को कैसे जी रहा है, उल्टा यह भी चाहता है कि उसका प्रिय हमेशा हँसता रहे उसे तनिक भी दुःख न हो, दुःख शब्द का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए उसके जीवन से..पर यह दुःख है की वह हमेशा किसी न किसी के सहारे चिपका रहता है, दुःख परजीवी है, वह अपने जीवन के लिए हमारा जीवन खाता है धीरे धीरे हम रोते है तो आँसू वही पीता है और बढ़ता रहता भीतर.. ऐसे लोग कितने किस्मत वाले हैं जिनके लिए कहीं कोई राह देख रहा है, जिनके लिए कोई मन सोच रहा है, वो कैसे होंगे जिन्हें कोई सोचता ही नहीं होगा, ऐसे लोग तो होंगे ही न जीवन में ? मन को मनभर कह जाने के बाद लगता है क्या मैं ही इतना सोचता हूँ, इतनी भावनाओं का जवाब केवल चुप्पी कैसे हो सकती है? बोल जाने के बाद लगता...

अंततः खुल जाती है गाँठ

एक हद तक हम ख़ुद को रोकते हैं, लगातार रोकते हैं, फिर जब लगता है कि अब नहीं हो पाएगा, अब नहीं कहा तो हृदय नहीं उठा पाएगा भार तो फूट पड़ते हैं जैसे अचानक मिट्टी खोदते खोदते फुट पड़ता है पानी, हम पसर जाते हैं, ऐसी स्तिथि में हम किसी आकर में नहीं होते किसी रूप रंग में भी नहीं होते , हम बस होते हैं.. बिल्कुल बनावट से अलग साफ सच्चे आदम की तरह..अब जिसकी कल्पना भी फैंटसी है।  *********** खुद को किसी को सौंप देने के बाद  फिर यह कैसे जानें कि कितना हमें खुद को बचाए रखना है कि ख़ुद को भूलें न हम। क्या यह ईमानदारी है ? अच्छा ये ईमानदारी है क्या ?  *********** पत्थर किसी भावुक और अति संवेदनशील व्यक्ति का चेहरा है जिसकी आँख से आँसू सुख चुका है।  ************ मैं अपनी आंख अपना मन बदलना चाहता हूँ.. क्या भ्रमण से भरम दूर होते हैं ? मुझे यहाँ से जाना है कहीं मैं ऊब गया हूँ  ********** उम्मीद तहों में टूटती है, हमें परछाई दिखने लगती है पर हम स्वीकार नही करते , जब स्वीकार करने की स्थिति में होते हैं तब तक उम्मीद नयी उम्मीद से जुड़ जाती है।  ― 26 जनवरी 2025 / 11 बजे रात ―

काश !

एक कवि ने कल रात अपनी कुछ ताजा कविताएँ भेजीं थी एक सम्पादक को, उनकी मेज पर कई इच्छाओं से भरा एक पैड रखा था, शाम वो गुजर गए.. जबसे यह खबर सुनी है.. सोच रहा हूँ मैं ऐसे कब जाऊँगा, मैं मरके देखना चाहता हूँ कितनी आँखों में असल के आँसू कितने, कितने अपनी व्यस्तता के चलते भूल जाते हैं ,कितनों को याद रहता हूं मैं 13 दिन.. यह जीवन कितना नश्वर है, हम कितना फॉर ग्रांटेड लेते हैं अपनों को..हम घण्टों, हफ़्तों महीनों उनकी खबर तक नहीं लेते फिर उनके जाने पर शोक व्यक्त करते हैं। क्या अधिकार है हमें..?  काश !...  ― 25 जनवरी 2025 / शाम 9 बजे

मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ..

जिससे बात करने की सबसे गहरी इच्छा रहती है, उसी से बोलने को मेरे पास कोई शब्द ही नहीं होते, मैं चुप सोचता रहता हूँ कि क्या ऐसा बोलूं की उसे मेरे भीतर की ऊब का तनिक भी आभास न हो, उसे लगे न कि मैं उसका इंतजार कर रहा था, उसे न लगे की उसके बिना कितना अकेले हो जाता हूँ मैं.. जितनी देर वह नहीं रहता मैं उसे इतना सोच लेता हूँ इतना महसूस लेता हूँ , इतना बतिया लेता हूँ कि जब पास होता है तो सब शांत हो जाता है बोलना बहुत चाहता हूँ पर नहीं बोल पाता, शिकायत करना चाहता हूँ पर डरता हूँ, कहीं...  समझाना जितना आसान है समझना उतना ही मुश्किल  मैंने कई लोगों को समझाया रिश्तों के बारे प्रेम के बारे में जीवन की अनिमितताओं के बारे में पर अपने को समझा नहीं पाता, जीवन की तमाम योजनाओं का इच्छाओं का सामुहिक रूप से अंत हो रहा है, औरों से हँसकर कहता हूँ अरे सब अच्छा है.. पर जब ख़ुद से पूछता हूँ तो..हर बार कुछ जैसे हाथ से छूट जाता है, मैं भरभरा के रो पड़ता हूँ,  सुबह माँ पूछ रहीं थीं आँख क्यूँ सूजी हुई है मैं सच नहीं बोल पाया, झूठ बोल दिया की ज्यादा सो रहा हूँ आजकल न तो इसीलिए होगा।  मैं धीरे धीरे कि...

इन दिनों की बात

भावना उस नदी का नाम है जिस पर बाँध सम्भव नहीं हो पाया है, जहाँ जबरन प्रयास हुआ भी वहाँ कुछ अच्छा नहीं हुआ। पानी को देर तक किसी पात्र में रखने पर वह सड़ जाता है, मगर अपनी सड़न के साथ भी बह निकलता है, दिन, महीना, साल लग सकता है मगर वह निकलता जरूर है। भावना पानी ही है, वो भावना सबसे सुंदर है जो लगातार अपनी गति के साथ बह रहा है, जब भावना दबाई जाती है तो वह कभी भी सकारात्मक रूप में दुबारा नहीं फूटती, नकारात्मक ही फूटती है। इस बात के कई जीते जागते उदाहरण इस देश की आबोहवा में मौजूद हैं जो समय समय रिसने लगते हैं फिर उनपर टांका लगाकर रोका जाता है, हर बार का दबाब उसे और घातक ही करता जा रहा है। यह एक दिन अपने विनाशकारी रूप में फूटेगा.. तब कुछ काम नहीं आएगा।  ************ क्या है कहना इस जमीन के साथ धोखेबाज़ी होगी कि मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता ?  ************* जब भी हम कहीं एक जगह होते हैं तो कई और जगहों पर नहीं हो पाते, दरअसल नहीं होना ही ईमानदारी है, लेकिन यही ईमानदारी कहीं अमानुषिकता है, कहीं छल, कहीं कुछ और..  फिर करें क्या ? क्या कहीं न होकर नहीं रहा जा सकता ? अजीब है! ल...

याद नहीं रहने की याद

अपने को भूलकर ही अपनों के बीच जिया जा सकता है। मैं जानता हूँ इस वाक्य के बाद आपके पास कई तर्क होंगे, जैसे सबसे सस्ता वाला होगा कि अपने जो होंगे वो आपको भूलने ही नहीं देंगे की आप क्या हैं, पर मेरा भरोसा कीजिए आप एक दिन इसी वाक्य के साथ सबसे बुरी तरह परास्त होंगे उस दिन आपको यह आभास होगा कि हर दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के साथ मस्त है, आप की अनुपस्थिति कहीं खटक नहीं रही है, हर व्यक्ति की अनुपस्थिति को भरने के लिए कोई न कोई उपस्थित है। दरअसल मामला सबसे सरल यह है कि आप समझें जिसके जीवन में बहुत करीबी हैं, उसके लिए कोई भी करीबी नहीं है, सब एक निमित्त मात्र हैं, जब जो जरूरत होगी वह करीबी होगा, फिर उस करीबी के जीवन में क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता... कई उदाहरण हैं  मगर ख़ैर छोड़िए.. ************ जबसे जन्म हुआ है, जीवन यहीं जन्मभूमि से 150 किलोमीटर के दायरे में सिमट गया है। कभी कहीं बाहर गया भी तो मजबूरन या परीक्षा के सिलसिले में, बाहर जाने का मन करता रहा पर मन ही बाहर गया मैं न अभी हरिद्वार जा सका, न उज्जैन, न दक्षिण में कहीं जा पाया , न मध्य में, न पूर्व में ही कहीं, केदारन...

बँटा हुआ है मेरा जीवन, बावन खण्डों में कटा हुआ

बिस्तर छोड़कर जब बाहर निकला तो चारों ओर गहरा धुन्ध छाया हुआ था, मन हुआ लौटकर फिर बिस्तर में ही पड़ा रहूँ। मगर चार नए जीवन की बालसुलभ शैतानी ने रोक लिया, तीन छोटे छोटे पिल्ले हैं उन्हें सुबह अधिक दुलार आता है, देखते ही आसपास पूँछ मटकाते हुए दौड़ते हैं, आगे के दोनों पाँव पटककर खेलते हैं, बिल्कुल छोटे टैडीबियर की तरह है गोल मटोल मुलायम से बिल्कुल, इनकी माँ ने इन्हें इस बार बहुत सम्भाल कर रखा था, दो महीने वो उस जगह से निकल नहीं पाए जहाँ उन्हें जन्म दिया था। अब वो निकलते हैं। टहलते हैं। मम्मी को देख लेते हैं तो जैसे खुशी से पागल हो जाते हैं उनके आसपास ऐसे उठते गिरते हैं की देखते बनता, उनकी साड़ी की कोर खींचते हैं, मनभर खेलते हैं, और एक हमारे हीरो हैं सोना के अकेले दीपक, बड़ी बड़ी आँख और कान लिए अपनी माँ का दूध पी लेने के बाद पूरे अहाते में ऐसे कुलांचे भरते हैं जैसे वो गाय के नहीं घोड़ी के बच्चे हों.. जानवरों के बच्चें हों आदमी के बच्चे हों या ख़ुद आदमी ही हों ये सुबह अधिक प्रेम से भरे होते हैं। इनकी स्फूर्ति नए ढंग से नए रंग रूप में दिखती है। मैं हर शाम जो होता हूँ, सुबह वह कभी नहीं होत...

दलों के दलदल में

हम पता नहीं क्या चाहते हैं, किस चीज़ को हर चीज़ में ख़ोज रहें हैं जो कहीं मिल ही नहीं रहा है। मन एक व्यक्ति की उपस्थिति और अनुपस्थिति से संचालित होता है। मन एक व्यक्ति की ख़ुशी से खुश होता है उसके दुख में दुःखी। अब तो कुछ मन का भी करता रहूँ तो न जाने क्या सोचता रहता हूँ, मन लगातार चीजों से, लोगों से, औपचारिकताओं से उठता जा रहा है। कहीं आने जाने का मन नहीं करता। तेज बोलते लोगों पर क्रोध इतना आता है कि समझ नहीं आता ये पागल हैं या मैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपयोग करने का बिल्कुल मन नहीं करता, करता भी हूँ तो बिल्कुल स्तब्ध सा जकड़ा हुआ बैठा रहता हूँ। मुझे कभी ऐसे बिल्कुल जॉली टाइप महसूस नहीं होता, कभी भी नहीं लगता कि सब बहुत हल्का है, मन बस चुप रहने का करता है। या न्यूनतम बोलने का। मैं जानता हूँ ऐसे तो सामान्य जीवन जीना बड़ा मुश्किल होगा, मगर क्या करूं समझ नहीं पाता ? क्या मुझे जीना नहीं चाहिए? पिछले 15 सालों में जितना साहित्य पढा वह कहीं जमीन पर नहीं दिखता कोई बदलाव नहीं होते, साहित्य लिखने वाले ही उन्हीं लिप्साओं में उलझे हैं, लोगों की नज़र में अब मनुष्य मनुष्य बाद में है पहले कोई न कोई संगठन है, ...

ऊब

ऊब . ऊब.. और बस ऊब दो चार पन्ने पलटे, भीतर अजीब सी मायूसी छाई रही  एक याद है जो आती ही रहती है.. कमी भरती ही नहीं रह रहकर आँख भरती है, स्वेटर की कोर से आँख रगड़कर पोंछ लेता हूँ।  कई बार कुछ कुछ चीजों से हटने पर समझ आता है आपका होना न होना वहां किसी गिनती का था भी नहीं। हम ऐसी ही जगहो पर क्यूँ होते हैं ?  आदमी .....  कुछ नहीं, सब ठीक है ।  19 जनवरी 2025/  रात10 बजे

रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान

सतत प्रयास करके भी बहुत सारी रूढ़ियों को ख़त्म नहीं कर पा रहा हूँ, मैं जितने दिन रहकर उस पनपते कँटीले पेड़ को काटता हूँ , जैसे छोड़ता हूँ वह उससे दोगुनी जगह घेर लेता है और अधिक हरा भरा हो जाता है, इसको पोषण देतीं हैं हमारी बुढ़िया संस्कृति जिसका अपना हर अंग बेकाम हो गया है। मैं जबसे जानकार हुआ हूँ लगातार यह प्रयास करता रहा की मैं पहले वह परिर्वतन अपने घर में लाऊं जो बाहर बोलना चाहता हूँ पर मैं हर बार फेल ही हुआ, सोचता था परिवार में किसी शादी में दहेज नहीं लेने दूँगा, बड़े भाईयों की शादी में उनके पिताओं ने लिया, बहनों की शादी में हमारे पिता ने दिया। बहनों पर कभी किसी प्रकार की पाबंदी नहीं रही, वो पढ़ी लिखी, मेहनत की पर अभी कहीं जॉब नहीं कर रहीं हैं, प्रयासरत हैं, पर जब उनको चली आ रही जीवन शैली में रमी देखता हूँ मुझके कुढ़न होती हैं, उस शिक्षा का मतलब समझ ही नहीं आता मुझे, पुरूष भी वैसे ही हैं उन्होंने पढ़ाई ख़ूब की डिग्री ख़ूब है पर शिक्षित नहीं है, वो अभी उसी आँख से दुनिया देखते हैं जो आज से 2 हज़ार साल पहले वो साधू संत लिखकर गए थे जो खुद दृढ़प्रतिज्ञ नहीं थे एक अप्सरा की पुकार पर अपना ध्यान भूल जा...

जीवन अभी झरना शेष है

मैं अपना सब लूटा देने के बाद भी नहीं चाहता हूँ कि कोई मेरे लिए कुछ करे, जब कोई कुछ कर देता है तो भीतर अजीब सा कुछ होता है लगता है मेरा दिल बैठा जा रहा है। मुझे अपने आसपास के हर व्यक्ति के लिए बस करना पसंद है। उनसे मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए। दर'असल मैं स्वीकार नहीं कर पाता की कोई मेरे लिए भी सोच सकता है। पिछले कई महीनों से मैं अपने को देख रहा हूँ जब भी कोई कुछ मेरे लिए कर देता है मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ, मैं समझ ही नहीं पाता इसे कैसे स्वीकार करूँ.. जबकि ऐसा नहीं है कि मुझे चाहिए नहीं वह, प्रेम भला किसे नहीं चाहिए। यह किस चीज़ का अ-स्वीकार है यह मैं नहीं जानता, सम्भवतः यह ख़ुद का ही नकार है, मैंने वर्षों तक अपना मन दबाया अपने को हर जगह पीछे रखा अब जब कोई कुछ करता है तो मन स्वीकार ही नहीं पाता। यह पहले ही मैं कहीं कह चुका हूँ कि प्रेम तर्क का नहीं स्वीकार्यता का विषय है, मगर स्वीकार्यता त्वरित नहीं आती, वह चरणों में आती है, पूर्ण स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए पूर्ण नकार तक जाना पड़ता है। मैं कहाँ हूँ पता नहीं.. ************* आज दिन यात्रा में गुजरा उसका शहर छोड़ रहा था तो लग रहा था ज...

शब्दों में कैसे रोया जा सकता है ?

हम सब अपनी अपनी ज़मीन पर लड़ रहें हैं। हमारे संघर्ष हमारे अलावा कोई नहीं देखता। देखना भी नहीं चाहिए अन्यथा हम एक दूसरे से प्रेमभाव कम दयाभाव अधिक रखेंगे। दया और प्रेम में अंतर है बहुत बड़ा अंतर ।  ********** सबसे गहरी रुलाई हम बिना आसूँ बहाए रोते हैं।  *********** इतने आदमी हैं फिर भी हर आदमी अकेला है। क्यूँ ?  *********** नींद न आने की भी एक सीमा होती है, हम अपनी मन की जगह पाते ही छोटे बच्चों की तरह सोते हैं। फिर वो नींद कुछ पल की ही क्यूँ न हो पूरी लगती है।  *********** इन दिनों अश्वघोष को पढ़ रहा हूँ, बुद्ध को समझ रहा हूँ, और बार बार महसूस रहा हूँ कि परिवारिक जीवन जीना है तो साधू संतों से दूर रहना चाहिए, और साधू संतों के पास रहना है तो परिवारिक जीवन से.. दोनों एक साथ सम्भव नही। दोनों साधने में हम कई जिंदगी बर्बाद करते हैं।  ***********  जीवन जीना पग पग पर समझौता करना है, अपने प्रिय व्यक्ति से दूर रहना है। ऐसे जीवन मुझे नहीं जीना। मैं अब मर जाना चाहता हूँ... काश! यह डायरी का आख़िरी पन्ना होता। तो मैं इसमें लिखता मैं बहुत खुश हूँ। इतना ख़ुश की नहीं चाहता की...

जलं नदीनां च नृणां च यौवनम्

संस्कृत कवियों ने नायक को चार प्रकार का बताया है। इन चारों प्रकारों में जो पहला प्रकार है जिसे धीरोदात्त नायक कहते हैं उसके अंतर्गत राम आते हैं, दुष्यंत आते हैं, भीष्म आते हैं। यह वो लोग थे जिन्होंने अपने कहे के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। मगर सोचने की बात है आज जब लोग अपनी कही बात को घण्टे भर में पलट दे रहें हैं जब इतने साधन हैं इतनी सुविधा है, जब इतने विचारवान लोग हैं जो बाजारवाद के विरुद्ध लंबे लेख लिखते हैं और फिर उन्हीं लेखों को इकट्ठा करके छापकर बाजार में पुस्तक मेला लगाकर बेचते हैं तो उस समय का सोचकर देखिए जब कल्पित इतिहासकारों के अनुसार जब  भारतीयों के पास कोई ज्ञान नहीं था वो निरे मूर्ख और जंगली थे, खाल ओढ़कर जीते थे कबीले में रहते थे उनके  समाजिक संरचना भी नहीं थी। वह मनुष्य कहलाने लायक मनुष्य तो आक्रमणकारियों के साथ रहने से हुए, सभ्य जो अंग्रेजों से हुए उन असभ्य अमानुषिक लोगों का सोचिए जो अपनी कही बात के लिए मर मिटते थे। और आज के अनगिन और स्वघोषित नायकों का सोचिए जिन्हें इस समय के कवियों ने गढ़ा उनमें कितना अंतर है।  दरअसल मुझे यह सब याद इसलिए आ रहा है क्योंक...